Ved Vaani: जटिल नहीं है वेद-पुराणों को समझना, इन विभाजन क्रम से समझें

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Ved Vaani, Vedas: धार्मिक पुस्तकों की मोटाई, पन्नों की संख्या और भाषा की जटिलता आदि के कारण लोग इन्हें पढ़ने से पीछे हटते हैं. लेकिन वेद-पुराणों को मानव जाति के लिए ही बनाया गया है और इसकी व्याख्या व विभाजन भी इस प्रकार से की गई है कि इसे आसानी से समझा जा सके. लेकिन फिर भी लोग इसे जटिल समझकर इसे नहीं पढ़ते और वेद-पुराणों के बहुमूल्य ज्ञान से वंचित रह जाते हैं.

बता दें कि वेद-पुराणों को समझना बहुत आसान है, लेकिन यह तभी संभव है जब आपको इसके सही क्रम के बारे में पता हो. जिस तरह हम पहले वर्णमाला के अक्षर, फिर मात्रा और फिर पूरे वाक्य को पढ़ना सीखते हैं. ठीक उसी प्रकार सही क्रम के आधार पर वेद-पुराणों को समझना भी आसान हो जाता है. जानते हैं वेद-पुराणों के विभाजन क्रम के बारे में.

वेदों की उत्पत्ति  

वेद क्या है इसका सरल अर्थ है वेद ‘ज्ञान’ है. इसकी उत्पत्ति मनुष्यों द्वारा नहीं हुई बल्कि ऋषियों ने गहरी तपस्या के बाद भगवान की आवाज सुनी, जिसे वेद कहा जाता है. इसलिए वेद को ‘श्रुति’ कहा गया है.

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वेदों का विभाजन

वेद पद्य और गद्य भागों में विभाजित है. पद्य में रचित वेद के दो भाग ऋग्वेद और अथर्ववेद हैं. वहीं वेद का गद्य भाग यजुर्वेद और गायन भाग सामवेद है. वेद विस्तृत है, इसलिए इसे सरल विघि से समझने के लिए इसे वेदों को चार भागों में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद विभाजित किया गया और चार उपवेदों की रचना हुई, जो आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और स्थापत्यवेद हैं.

वेदांग के अंग कौन कौन से हैं

  • व्याकरण: इसका संबंध संस्कृत भाषा से संबंधित है.
  • ज्योतिष: यह खगोल विज्ञान से संबंधित है.
  • निरुक्त: यह वैदिक मंत्रों में निहित शब्दों की उत्पति से संबंधित होता है.
  • शिक्षा:  ध्वन्यात्मकता और वैदिक मंत्रों के उच्चारण का संबंध शिक्षा से है.
  • छंद: छंद वैदिक मंत्रों से संबंधित है.
    कल्प: कल्प सूत्र बलिदान की विधियों और आचार संहिता के नियमों से संबंधित हैं.

पुराण क्या है

पुराण में बहुमूल्य ज्ञान का समावेश है, जोकि वर्तमान आधुनिक समाज पर भी समान रूप से लागू होता है. पुराण एक सरलीकृत कहानी की तरह है जिसे साधारण मनुष्य द्वारा भी आसानी से समझकर उसका अनुसरण किया जा सकता है. सनातन धर्म में 18 पुराण हैं. इसमें पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, कर्म-अकर्म आदि की गाथाएं हैं. जोकि इस प्रकार से हैं- 1. विष्णु पुराण, 2. ब्रह्म पुराण, 3. ब्रह्मांड पुराण, 4. भागवत पुराण, 5. पदम पुराण, 6.वराह पुराण, 7. मतस्य पुराण, 8. कूर्म पुराण, 9. वामन पुराण, 10. गरुड़ पुराण, 11. ब्रह्म वैवर्त पुराण, 12. शिव पुराण, 13. लिंग पुराण, 14. स्कंद पुराण, 15. नारदीय पुराण, 16. अग्नि पुराण, 17. मार्कण्डेय पुराण और  18. भविष्य पुराण.

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