Munawwar Rana Ki Shayari: मुनव्‍वर राना की शायरी जिससे झलकती है मां की मुहब्‍बत

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Munawwar Rana Ki Shayari: उर्दू शायरी में मुनव्‍वर राना की अलग पहचान है. वह किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं हैं. उनका असल नाम सय्यद मुनव्वर अली है और उनकी पैदाइश 1 नवंबर, 1952 को उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुई थी. 2014 में उन्‍हें साहित्य अकादमी अवार्ड से नवाज़ा गया. उर्दू शायरी में अहम मुकाम रखने वाले मुनव्‍वर राना की शायरी दिल से निकली आवाज है. उर्दू ग़ज़ल (Ghazal) भले ही इश्‍क़ (Love) और माशूका के इर्द-गिर्द घूमती रही हो, मगर जहां इसमें हर विषय ख़ूबसूरत अल्‍फ़ाज़ (Words) में ढला नज़र आता है, वहीं शेरो-सुख़न (Shayari) की दुनिया में मां के मुक़द्दस रिश्ते पर भी गहराई से लिखा गया है. अज़ीम शायर मुनव्वर राना ने मां के मुक़द्दस रिश्‍ते को ख़ूबसूरत और मुहब्‍बत भरे अल्‍फ़ाज़ में इस तरह बयां किया है कि सुनने वाले इनके ज़रिये अपने रिश्‍तों की गहराई को महसूस करते हैं. उनकी शायरी में मां की अहमियत झलकती है. उनके कलाम में रिश्‍तों की ख़ूबसूरती को बेहद दिलकश अंदाज़ में पिरोया गया है. आज पेश है मुनव्वर राना की दिलों को छू लेने वाली शायरी और उनका अंदाज़े-बयां-

मेरे हिस्से में मां आई…
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई

मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में मां आई

यहां से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया

मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के मां आई

अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता

बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहां आई

किसी को गांव से परदेस ले जाएगी फिर शायद

उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआं आई

मेरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी

तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूं उर्दू ज़बां आई

क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता

ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ां आई

घरौंदे तो घरौंदे हैं चट्टानें टूट जाती हैं

उड़ाने के लिए आंधी अगर नाम-ओ-निशां आई

कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती

इधर पहुंची उधर पहुंची यहां आई वहां आई

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मुहब्बत करने वाला इसलिए…
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है

मुहब्बत करने वाला इसलिए बरबाद रहता है

अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है

परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है

चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं

उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है

लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में

जिधर से भी गुज़रता हूं मैं रस्ता याद रहता है

हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं ‘राना’

हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है

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मां बैठ के तकती थी…
अलमारी से ख़त उस के पुराने निकल आए

फिर से मेरे चेहरे पे ये दाने निकल आए

मां बैठ के तकती थी जहां से मेरा रस्ता

मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए

मुमकिन है हमें गांव भी पहचान न पाए

बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए

ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है

आंखों को भिगोने के बहाने निकल आए

अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते

हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए

एक ख़ौफ़ सा रहता है मेरे दिल में हमेशा

किस घर से तेरी याद न जाने निकल आए

(साभार/रेख्‍़ता)



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