Mahabharat: कौन थी गांधारी जो दुर्योधन को बनाना चाहती थीं वज्र

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Mahabharat In Hindi: महाभारत की कथा में जिन स्त्रियों का वर्णन आता है उनमें एक नाम गांधारी का भी है. गांधारी को एक पतिव्रता और आदर्श नारी माना जाता है. गांधारी गांधार देश के सुबल नामक  राजा की पुत्री थीं. गांधार देश की होने के कारण ही उनका नाम गांधारी पड़ा. गांधारी भगवान शिव की परम भक्त थीं. महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद गांधारी अपने पति, कुंती और विदुर के साथ वन में चली गयीं.

धृतराष्ट्र से विवाह होने के बाद ही बांध ली थी आंखों पट्टी

जब गांधारी का विवाह नेत्रहीन धृतराष्ट्र से हुआ तो गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली. गांधारी का कहना था कि जब मेरे पति ही नेत्रहीन हैं, तो उन्हें संसार को देखने का अधिकार नहीं है. गांधारी का भाई शकुनि इस विवाह से प्रसन्न नहीं था. शिव भक्त होने के कारण गांधारी को भगवान शिव ने सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान दिया था.

दुर्योधन के जन्म पर हुए कई अपशकुन

गांधारी ने अपने पहले पुत्र का नाम दुर्योधन रखा. कहते हैं जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो उस समय कई अपशकुन हुए. दुर्योधन ने जन्म लेते ही बोलना प्रारंभ कर दिया था. तब विदुर और विद्वानों ने धृतराष्ट्र से इस बालक का त्याग कर देन के लिए कहा. विद्वान और ज्योतिषियों ने कहा कि यदि कौरव वंश की रक्षा करनी है तो दुर्योधन का त्याग कर दें नहीं तो अनिष्ट होने से कोई नहीं रोक पाएगा. लेकिन पुत्रमोह में दुर्योधन का त्याग नहीं किया जा सका.

गांधारी नहीं चाहती थीं महाभारत का युद्

गांधारी महाभारत का युद्ध नहीं चाहती थीं. महाभारत का युद्ध आरंभ होने से पहले जब भगवान श्रीकृष्ण सन्धि के लिए शान्तिदूत बनकर हस्तिनापुर गये तो  उन्होंने दुर्योधन के सामने पाण्डवों को पांच गांव देने प्रस्ताव रखा लेकिन दुर्योधन ने यह प्रस्ताव को ठुकरा दिया. जब ये बात गांधारी को मालूम हुई तो उन्होने दुर्योधन को श्रीकृष्ण के प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए कहा. गांधारी ने दुर्योधन से ये भी कहा कि भगवान श्रीकृष्ण, भीष्म, द्रोणाचार्य और विदुर ने जो बातें तुमसे कही हैं, उन्हें स्वीकार करने में ही तुम्हारा हित है. लेकिन दुर्योधन ने माता गांधारी की भी सलाह नहीं मानी और परिणाम महाभारत के युद्ध के रूप में सामने आया.

दुर्योधन को बनाना चाहती थी व्रज

महाभारत के युद्ध में जब सभी कौरवों की मृत्यु हो गई तो दुर्योधन को गांधारी को व्रज बनाने का निर्णय लिया. गांधारी ने भगवान शिव से यह वरदान पाया था कि वह जिस किसी को भी अपने नेत्रों की पट्टी खोलकर नग्नावस्था में देखेगी तो उसका पूरा शरीर वज्र का हो जायेगा. गांधारी ने दुर्योधन से कहा कि वह गंगा में स्नान करने के बाद उनके सामने नग्न अवस्था में उपस्थित हो. लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने इस बात को जान लिया और मार्ग में ही श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को रोक लिया और ये कहा कि इतने बड़े होने के बाद भी मां के पास नग्न होकर जाओगे. दुर्योधन श्रीकृष्ण की बातों में आ गया और जंघा पर पत्ते लपेट लिए और गांधारी के समक्ष उपस्थित हो गया. जब गांधारी ने अपने नेत्रों से पट्टी खोलकर उसे देखा तो उसकी दिव्य दृष्टि जंघा पर नहीं पड़ सकी, जिस कारण दुर्योधन की जंघाएँ वज्र की नहीं हो सकीं और अंत में यही दुर्योधन की मौत का कारण बना.

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