Food history: जिस इंदौरी पोहे के दीवाने हैं अमिताभ से लेकर द्रविड़, उसे इंदौर लाया था ये शख्स…

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भूपेंद्र राय/इंदौर: लोगों में पोहे की अटूट दीवानगी देखनी हो तो देश के दिल यानी मध्यप्रदेश आइए. यहां की आर्थिक राजधानी कहे जाना वाला इंदौर इसका जीता जागता उदाहरण है. यहां के लोगों के बारे में यह कहा जाता है कि यदि कोई इंदौरवासी पोहा, जीरावन, सेंव, जलेबी से दूरी रखता है तो वो असल इंदौरी हो ही नहीं सकता. इसी दीवानगी की वजह से इंदौरी पोहे का नाम पूरे देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी मशहूर है. 

90 प्रतिशत लोगों के दिन की शुरुआत पोहा खाकर होती है
आप जब भी इंदौर की धरती पर कदम रखते हैं तो एक खुशबू हवा में तैरने लगती है, स्टेशन पर उतरे नहीं कि बाहर निकलते ही बड़े से कड़ाहों में से आ रही ये खुशबू आपको अपनी तरफ खींचने लगती है. यह खुशबू होती है सिर्फ इंदौरी पोहे की. खास बात ये है कि दुनिया में इंदौर ही एकमात्र ऐसा शहर है, जहां के 90 प्रतिशत लोगों के दिन की शुरुआत पोहा खाकर होती है. 

क्या है इंदौरी पोहे का इतिहास
बताया जाता है इंदौर में पोहा देश की आजादी के करीब दो साल बाद 1949-1950 में आया. जब महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के निज़ामपुर में 1923 में जन्मे पुरुषोत्तम जोशी अपनी बुआ के घर इंदौर आए और यहीं के होकर रह गए. उन्होंने गोदरेज कम्पनी में सेल्समैनशिप की, लेकिन उन्हें कुछ अपना ही करने की चाहत थी. सबसे पहले आज के तिलकपथ पर उन्होंने उपहार गृह की स्थापना की. युवा पुरुषोत्तम ने अपने इस ठिये पर बावर्ची, वेटर और कैशियर की जिम्मेदारियां भी निभाईं. 

इंदौर के 56 दुकान व्यापारी संघ के अध्यक्ष और यंगतरंग रेस्टोरेंट के मालिक गुंजन शर्मा की मानें तो इंदौर में पोहा बेचने वाली कोई दुकान नहीं थी, वो पुरुषोत्तम जोशी ही पहले शख्स थे, जिन्होंने पोहे को इंदौर के भोजन प्रेमी बाजार में जगह दिलाई. 56 साल के गुंजन शर्मा बताते हैं कि जब पुरुषोत्तम जोशी ने प्रशांत उपहार गृह के नाम से  पोहे की दुकान खोली तो यहां के लोगों को पोहा इतना भाया कि यह इंदौर की पहचान बन गया. अब पोहा इंदौर की लाइफलाइन बन गया है और इसके बिना लोगों का सबेरा नहीं होता.

24 घंटे मिलता है पोहा
इंदौर आने वाले पर्यटक भी इससे दूर नहीं रह पाते और बड़े ही चाव से पोहे का आनंद लेते हैं. इंदौर की कोई गली, कोई कोना ऐसा नहीं होगा जहां पोहे की कड़ाही या गुमटी/ठेले न हों. यहां तक कि मॉर्निंग वॉक या जिम से लौटने के बाद यदि पोहा-जलेबी ना खाया तो अधूरा ही रहा. खास बात ये है कि सामान्य दिनों में यहां खाने वालों के लिए 24 घंटे पोहा मिलता है और रोजाना तीन से चार टन खपत अकेले इंदौर में होती है.

जवाहर लाल नेहरू से लेकर अमिताभ बच्चन तक
आम आदमी हो या कोई खास हस्ती. सब इंदौरी पोहे के दीवाने हैं. एक बार स्वाद लेने के बाद वो इसके मुरीद हो जाते हैं. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इंदौरी पोहे का लुत्फ ले चुके हैं. सदी के महानायक मशहूर अभिनेता अमिताभ बच्चन भी इंदौरी पोहे की लज्जत का अलग-अलग मौकों पर जिक्र कर चुके हैं. वे कौन बनेगा करोड़पति में भी इंदौरी पोहे से संबंधित सवाल पूछ चुके हैं.

क्रिकेटर्स भी हैं दीवाने
साल 2019 में इंदौर के होल्कर स्टेडियम में विराट कोहली बांग्लादेश के खिलाफ टेस्ट के दूसरे दिन बिना खाता खोले ही शून्य पर आउट होकर पवेलियन लौट गए थे. तब इंदौर के लोगों ने यह कहकर खिंचाई की थी कि ‘अगर कोहली पोहा खाकर खेलने जाते तो शतक मार के ही वापस आते’. इसी सीरीज के दौरान गौतम गंभीर, वी वी एस लक्ष्मण और कमेंटेटर जतिन सप्रू की फोटो पोहा-जलेबी खाते हुए खूब वायरल हुई थी. क्रिकेटर राहुल द्रविड इंदौरी पोहा खाने के शौकीन हैं.

फेमस पोहे के ठिकाने
इंदौर में वैसे तो हर प्रमुख चौराहों पर पोहा आपको मिलेगा, लेकिन 56 दुकान के पोहे, पत्रकार कॉलोनी में रवि अल्पहार के पोहे, राजबाड़ा पर लक्ष्मी मंदिर के पास की दुकान के पोहे, रात में सरवटे बस स्टेड के पोहे, जेएमबी दुकान के पोहे अपनी अलग पहचान रखते हैं.

GI टैग की सिफारिश
इंदौरी पोहे और सेव के लिए जीआई टैग की सिफारिश की जा रही है. आपको बता दें कि जीआई टैग (ज्योग्राफिकल इंडेक्स टैग) ऐसे उत्पादों को मिलता है, जिसकी एक भौगोलिक पहचान होती है. पोहे को जीआई टैग मिलने के बाद यह आधिकारिक तौर पर इंदौर का ही कहलाएगा.

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