विवाह पंचमी पर अब नहीं होती हैं शादियां, जानिए वजह

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Vivah Panchami 2021: हिंदू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को विवाह पंचमी मनाई जाती है. इस बार विवाह पंचमी 8 दिसंबर 2021 को पड़ रही है. पौराणिक मान्यता अनुसार, इस दिन सीता का स्वयंवर हुआ था, जिसमें श्रीराम से उनका विवाह हुआ. यूं तो विवाह पंचमी का सभी पुराणों में विशेष महत्व है इसके बावजूद  कई जगह इस दिन कोई विवाह नहीं किया जाता है. धार्मिक लिहाज से इस उत्सव का अत्यधिक है मगर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, मिथिलांचल और नेपाल में इस दिन विवाह नहीं किए जाते हैं. सीता के दुखद वैवाहिक जीवन को देखते हुए इस दिन विवाह निषेध होते हैं.

भौगोलिक रूप से सीता मिथिला की बेटी कही जाती हैं, इसलिए भी मिथिलावासी उनके कष्टों के लिए बेहद संवेदनशील हैं. 14 साल वनवास के बावजूद गर्भवती सीता का परित्याग किए जाने के बाद राजकुमारी सीता को महारानी सीता का सुख नहीं मिला. यही वजह है कि विवाह पंचमी के दिन लोग बेटियों की शादी नहीं करते हैं. आशंका रहती है कि कहीं सीता की तरह ही उनकी बेटी का वैवाहिक जीवन दुखमय न हो.

विवाह पर ही हो जाता है रामकथा का अंत
इन इलाकों में विवाह पंचमी पर होने वाली रामकथा का अंत राम और सीता के विवाह पर ही हो जाता है. दोनों के जीवन के आगे की कथा दुख और कष्ट से भरी है इसलिए इस शुभ दिन का अंत उनके विवाह की सुखद स्थिति पर ही किया जाता है.

श्रीराम-सीता की विवाह कथा 
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार भगवान राम और देवी सीता भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के अवतार हैं. दोनों ने ही समाज में आदर्श और मर्यादित जीवन की मिसाल के लिए अवतार लिया. अगहन शुक्ल पंचमी को राम-सीता का विवाह मिथिलांचल में हुआ था. माता सीता का जन्म धरती से हुआ है, जब जनक हल चला रहे थे तो  उन्हें नन्हीं-सी बच्ची मिली थी। इसे ही नाम दिया गया सीता, यही जनकनंदिनी कहलाईं. मान्यता है कि एक बार बचपन में सीता ने मंदिर में रखे धनुष को सहजता से उठा लिया. इस धनुष को तब तक परशुराम के अतिरिक्त किसी ने उठाया नहीं था. तब जनक ने निर्णय लिया कि जो शिव का यह धनुष उठा पाएगा, उससे सीता का विवाह होगा. सीता स्वयंवर में भगवान राम और लक्ष्मण दर्शक के रूप में पहुंचे थे. कई राजाओं ने प्रयास किए, लेकिन कोई धनुष हिला न सका. हताश जनक ने करुण शब्दों में पीड़ा व्यक्त की ‘क्या कोई भी मेरी पुत्री के योग्य नहीं है? तब भगवान राम इस स्वयंवर में आए और गुरु की आज्ञा का पालन कर धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे कि धनुष टूट गया. इसके बाद राम-सीता के विवाह की वर्षगांठ को पंचमी उत्सव मनाया जाता है.

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