महाभारत: युद्ध में ऐसे बची पांचों पांडवों की जान, भीष्म ने दुर्योधन को दिए थे पांच विशेष स्वर्ण तीर

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Mahabharat Yudh In Hindi: महाभारत का युद्ध महा विनाशकारी युद्ध था. यह युद्ध कौरव और पांडवों के बीच लड़ा गया. जिसमें कौरावों के पास पांडवों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत सेना थी. बावजूद इसके युद्ध में कौरवों की पराजय हुई.

Mahabharata story: महाभारत का युद्ध जब आरंभ हुआ तो कौरवों के पास, पांडवों की तुलना में सैन्य बल अधिक था.भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण जैसे एक से बढ़कर एक महारथी भी थे. लेकिन फिर भी युद्ध में पांडव विजय की ओर बढ़ते ही जा रहे थे. यह देख दुर्योधन को बहुत क्रोध आता था. दुर्योधन इसका सारा दोष पितामह भीष्म को देता. दुर्योधन उन पर ये दोषारोपण करता हैं कि वे पांडवों से अधिक प्रेम करते हैं. जिस कारण वे जान बूझकर युद्ध का संचालन अच्छे ढंग से नहीं कर रहे हैं. जिसके चलते कौरवों की सेना को युद्ध में हर दिन नुकसान उठाना पड़ रहा है.

दुर्योधन की इन बातों को सुनकर भीष्म को अच्छा नहीं लगता है. क्योंकि कोई उनकी निष्ठा पर प्रश्न उठाए ये उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं था. जब उनसे नहीं रहा गया तो भीष्म ने दुर्योधन को तरकस से पांच स्वर्ण तीर निकालकर मंत्रों का उच्चारण करके उन्हें अभिमंत्रित करते हैं. भीष्म कहते हैं कि दुर्योधन कल इन्हीं तीरों से वे पांचों पांडवों का वध करेंगे.

दुर्योधन इस बात से बहुत प्रसन्न होता है. लेकिन उसे भीष्म पर पूरा भरोसा नहीं होता है. दुर्योधन भीष्म से कहता है पितामाह आप ये 5 स्वर्ण तीर मुझे दे दें. रात्रि में ये तीर मेरी सुरक्षा में रहेंगे. युद्ध आरंभ होने से पूर्व प्रात:काल में ये 5 तीर मैं आपको सौंप दूंगा. तब आप रणभूमि में इन तीरों से पांचों पांडवों का वध कर देना. भीष्म दुर्योधन के मन की बात को समझ जाते हैं लेकिन वे उसे तीर सौंप देते हैं.

दुर्योधन ने अर्जुन को दिया था वरदान


महाभारत के युद्ध से पहले जब सभी पांडव वन में निवास कर रहे थे. तो पांडवों के निवास स्थान पर एक तालाब था. इस तालाब में दुर्योधन कभी कभी स्नान करने आता था. एक दिन जब दुर्योधन तालाब से स्नान करके निकला तो वहां अचानक ही स्वर्ग से गंधर्व आ गए. गंधर्व और दुर्योधन के बीच विवाद शुरू हो जाता है. दुर्योधन गंधर्व से पराजित हो जाता है और दुर्योधन को वे बंदी बना लेते हैं. यह बात किसी तरह से अर्जुन को पता चल जाती है और वे दुर्योधन को मुक्त कराने के लिए गंधर्व से युद्ध करते हैं और दुर्योधन को मुक्त करा लेते हैं. इस पर दुर्योधन अर्जुन के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है और इसी के  साथ दुर्योधन अर्जुन को वरदान मांगने को कहता हैं. लेकिन अर्जुन कहते हैं कि वे समय आने पर अवश्य ही कोई वरदान मांग लेंगे.

श्रीकृष्ण को तीरों के बारे में हो जाती है खबर

पितामह भीष्म के अभिमंत्रित तीरों की जानकारी श्रीकृष्ण को उनके गुप्तचरों से हो जाती है. तब वे पांडवों की सुरक्षा के लिए अर्जुन को उस वरदान की याद दिलाते हैं. जो दुर्योधन के प्राण बचाने पर उसने माँगने के लिए कहा था. भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उसी समय दुर्योधन के पास भेजते हैं और अपने उस वरदान का स्मरण कराते हुए दुर्योधन से स्वर्ण तीरों को मांगते हैं. अर्जुन की ये बात सुनकर दुर्योधन हैरान रह जाता है. लेकिन अपने वचन के कारण दुर्योधन अभिमन्त्रित पांचों स्वर्ण तीर अर्जुन को वरदान स्वरुप दे देता है. इस तरह से पांडवों की जान बच जाती है.

दुर्योधन भीष्म से दोबारा मांगता है तीर

सभी तीर देने के बाद दुर्योधन रात में ही पितामह भीष्म के शिविर में जाता है और पूरी बात बताते हुए दोबारा तीरों को अभिमंत्रित करने के लिए कहता है लेकिन भीष्म ऐसा करने से मना कर देते हैं और कहते हैं कि वे सिर्फ एक बार ही तीरों को अभिमंत्रित कर सकते हैं. इस पर दुर्योधन निराश होकर वापिस लौट जाता है.

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