‘पक्षियों की चहचहाहट’ और ‘हवा के झोंकों’ में छिपा अबूझ बीमारियों का इलाज

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नई दिल्‍ली. अक्‍सर ऐसा होता है कि आप किसी बीमारी के चलते बेहद असज महसूस कर रहे होते हैं, लेकिन डॉक्‍टर की सलाह पर कराई गई पैथालॉजी या दूसरी जांच के रिजल्‍ट में सब कुछ सामान्‍य पाया जाता है. ऐसे में, कई डॉक्‍टर्स आपको सब कुछ ठीक होने की बात कह कर चलता कर देते हैं, लेकिन आपके लिए दिक्‍कत जस की तस बनी रहती है. ऐसी ही कुछ अबूझ बीमारियों का अद्भुत इलाज लेकर हम आपके पास आए है. और, यह इलाज ‘हीग लगे न फिटिकरी, रंग चोखा’ जैसा है. यहां आपको बता दे कि इन अबूझ बीमारियों के अद्भुत इलाज को आपतक पहुंचाने में हमारी मदद की है, दिल्‍ली के साकेत मैक्स सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान विभाग के निदेशक और प्रमुख डॉ. समीर मल्होत्रा ने.

अब ज्‍यादा सस्‍पेंस न रखते हुए आपको बताते हैं अबूझ बीमारी और उनके इलाज के बारे में. सबसे पहले बात करते है फाइब्रो माइंजिया (Fibromyalgia) नामक बीमारी की. फाइब्रो माइंजिया एक ऐसी बीमारी है, जिसमें आपके शरीर के अगल अलग हिस्‍सों में दर्द रहता है और इस दर्द का कारण किसी भी जांच में पकड़ मे नहीं आता है. दरअसल, यह बीमारी शरीर में रसायनिक असंतुलन की वजह से होता है. रसायनिक असंतुलन का सीधा प्रभाव आपके शरीर की नशों पर पड़ता है, जिसके चलते आपको शहरी के अलग-अलग अंगों में तेज दर्द होने लगता है.  फाइब्रो माइंजिया के चलते शरीर में होने वाले इस अजीबो गरीब दर्द के इलाज के लिए आप महीनों डॉक्‍टरों के चक्‍कर लगाते हैं और हजारों रुपए मेडिकल जांच में खर्च कर देते हैं, लेकिन नतीजा सिफर ही रहता है.

आपकी अबूझ बीमारी का अद्भुत इलाज
अब आइए, बात करते हैं आपकी अबूझ बीमारी के अद्भुत इलाज की. इस बीमारी का इलाज सुनकर आप एक बारगी दंग हो जाएंगे, लेकिन जब आप कुछ दिन इस इस इलाज को करेंगे तो इसके फायदे आपको अपने आप ही नजर आना शुरू हो जाएंगे. जी हां, इस अबूझ और अजीबो-गरीब दर्द वाली बीमारी से निजात पाने के लिए आपको प्रकृति से दोस्‍ती करनी होगी और रोजना सुबह-शाम हवा के झोंकों को महसूस करते हुए पक्षियों की चहचहाहट सुननी होगी. आपको पक्षियों की चहचहाहट में इस कदर दिल लगाना होगा, कि उसमें भी आपको संगीत सुनाई देने लग जाए. मुझे पता है, आपको यह इलाज थोड़ा अजीब सा लग रहा होगा, इसीलिए इसको डिटेल में समझने के लिए आपको डॉ. समीर मल्होत्रा की तरफ ले चलता हूं.

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डॉ. समीर मल्‍होत्रा बताते हैं कि मन और तन के बीच में गहरा रिश्‍ता होता है. अगर जहन में कोई तनाव, तकलीफ या परेशानी है तो उसके लक्षण आपके शरीर पर भी दिखना शुरू हो जाते हैं. इन लक्षणों में, बीपी बढ़ना, दिल की धड़कने तेज होना, बेवजह पेट की समस्‍याएं शुरू होना, अजीबो गरीब सिर दर्द रहना, पीठ का दर्द, शरीर मे अलग-अलग जगहों पर दर्द आदि शामिल है. अक्‍सर हमें, इस तरह की न तो वजह पता चलती है और न ही तमाम इलाज के बाद भी राहत मिलती है. यहीं, पर हम अगर प्रकृति से दोस्‍ती कर लें, तो आपको न सिर्फ फाइब्रो माइंजिया नामक बीमारी से निजात मिल जाएगी, बल्कि मेंटल स्‍ट्रेस, डिप्रेशन और इंजाइटी जैसी आपसे कोसो दूर चली जाएंगी .

कैसे होगी प्रकृति से सही वाली दोस्‍ती
डॉ. समीर मल्‍होत्रा बताते हैं कि तमाम अजीबों गरीब बीमारियों से निजात पाने के लिए आपको प्रकृति से सही मायने में दोस्‍ती करनी होगी. सही मायने में दोस्‍ती का मतलब है, आप आसपास मौजूद पेड़ पौधों को देखे, उनकी ग्रोथ को महसूस करना, यदि बारिश का मौसम है तो बारिश की बूदों की आवाज को ध्‍यान से सुनें, बूंदो के साथ आने वाली ठंडी हवा को गहराई तक महसूस करे, रात को आसपाम देखें, तारों को देखें, हवा के झोंको को महसूस करे, चिडि़यो या पक्षियों चहचहाहट को सुने आदि. यानी आप प्रकृति के साथ जितना अधिक जुड़ सकते हैं आप जुड़ जाएं. यह सब गतिविधियां आपको मानसिक शांति प्रदान करेंगे. इस तरह, जितनी जल्‍दी और जितना गहराई से आप प्रकृति के साथ जुड़ते जाएंगे, अूबझ बीमारियां उतना आपसे दूर भागती जाएंगी.

डॉ. समीर मल्‍होत्रा के अनुसार, बात यहां पर अभी खत्‍म नहीं होती है. वह बताते है कि प्रकृति से आपकी दोस्‍ती तब तक अधूरी रहेगी, जबकि तक आप सुबह उठना शुरू नही करते और सुबह-सुबह वॉक पर नहीं जाते है. दरअसल, सुबह की जो सनरेज (सूरज की किरणें) हैं, हमारे लिए जरूरी है. इन्‍ही सनरेज से संपर्क में आने के बाद हमारे शरीर के कुछ हार्मोंस रिलीज होते है. यदि हम लेट उठेंगे तो हम अपने आपको इन चीजों से वंचित कर जाएंगे. इसीलिए, तमाम परेशानियों और बीमारियों से बचने के लिए हमेशा से ब्रह्म मुहूर्त में उठने की बात कही गई है. जब सुबह आप प्रकृति के बीच में रहेंगे तो ज्‍यादा ऑक्‍सीजन लेंगे, जो आपके मन मस्तिस्‍क को स्‍वस्‍थ्‍य रखेगी. मन मस्तिस्‍क स्‍वस्‍थ्‍य रहेगा तो बाकी चीजें अपने आप ही सही होती जाएंगी.

प्रकृति से जुड़ने को लेकर क्‍या कहती है मेडिकल थ्‍योरी
अब बात करते हैं कि किस तरह प्रकृति हमें निरोग रहने में मदद करती है तो डॉ. समीर मल्‍होत्रा बनाते हैं कि जब आप नेचर से जुड़ते हैं, तब आप जजमेंटल नहीं होते हैं. आप अपनी जिंदगी के इर्द गिर्द निहार कर देखिए, आज की डेट में आदमी या तो किसी न किसी मुद्दे पर रियक्‍ट कर रहा होता है, या फिर जजमेंटल होता है. सुबह जगने से लेकर रात में सोने तक वह दो ही बात बता रहा होता है कि यह सही है या फिर यह गलत है. इतना ही नहीं, बहुत से लोग अपने रिएक्‍शन देते हुए जजमेंटल हो जाते हैं. कई बार आप परिस्थितयों की वजह से ज्‍यादा भावुक होकर भावनाओं को व्‍यकत करने लगते हैं. लेकिन जब कोई शख्‍स प्रकृति के पास जाता है तो रिएक्‍शन और जजमेंट बंद हो जाते हैं. वहां मन और मस्तिस्‍क सिर्फ और सिर्फ महसूस करता है.

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