दिल्ली में यहां चखें गोलगप्पे, कचौड़ी, समोसा, पापड़ी, कांजी वड़ा और कुल्फी फलूदा, ‘वैष्णव चाट भंडार’ है स्वाद का ठिकाना

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(डॉ. रामेश्वर दयाल)
Vaishnav Chaat Bhandar New Delhi: आज आपकी मुलाकात ऐसे ‘चाट वाले’ से करवाते हैं, जिसकी दुकान पर बहुत कुछ चटपटा मिलता है. यही कारण है कि उसकी दुकान पर बगल ही दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स (Delhi University Students) आते रहते हैं और ‘चाट’ खाते हुए देश-दुनिया पर बहस भी करते हैं. चूंकि यह दुकान दिल्ली (Delhi) के बड़े कमर्शियल इलाके में हैं, इसलिए वहां शॉपिंग के लिए आने वालों को भी चटपटे व्यंजन उनके मन को लुभाते हैं.

लाल मसाला आलू, लच्छा टोकरी से लेकर पनीर टिक्का तक

इस चटपटी दुकान का नाम है वैष्णव चाट भंडार (धर्मशाला की चाट) और यह नॉर्थ दिल्ली के बड़े कमर्शल बाजार कमला नगर में स्थित है. इस दुकान पर मिलने वाले चटपटे व्यंजन ऐसे हैं कि मुंह में पानी आना लाजमी है. उनकी एक बानगी देख लें. जैसे लाल आलू मसाला दही वाले, लच्छा टोकरी, राज कचौड़ी, कांजी वड़ा, कचौड़ी चाट, समोसा चाट, पाव भाजी, चीला, पनीर टिक्का, गोल गप्पे, भल्ला पापड़ी. और भी बहुत कुछ. इस दुकान पर आइए, जो मन कीजिए खाइए और पेट और दिमाग को प्रसन्न होता हुआ देखिए. अब इतना चटपटा खा लिया है तो कुछ मीठा तो बनता है. तो कुल्फी फलूदा खाइए, नहीं तो सेहत को और दुरुस्त करने के लिए केसर-पिस्ते वाली दूध की बोतल भी हाजिर है.

1958 से शुरू दुकान का जलवा आज भी कायम है

30 रुपये से लेकर 120 रुपये में मिलता है सब कुछ

इस दुकान पर मिलने वाले व्यंजनों के दाम जेब पर भारी पड़े वाले नहीं है. 30 रुपये से लेकर 120 रुपये में सब-कुछ हाजिर है. यही कारण है कि बगल की दिल्ली यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट़स इस दुकान पर अपनी क्षुधा शांत करने के लिए आते हैं और लगे हाथों वहां बड़ी-बड़ी बहस कर मानसिक भूख का भी शमन कर लेते हैं. चूंकि यह एक बहुत बड़ा बाजार है, इसलिए शॉपिंग करने वाले लोग भी इस दुकान पर नजर आते हैं. दुकान चलाने वालों का कहना है कि हमारी दुकान सालों से इसलिए मशहूर है, क्योंकि हम पुराने दिल्ली के थोक किराना बाजार खारी बावली से साबुत मसाले लाकर खुद पिसवाते हैं और खास मसाला बनाकर उसे व्यंजनों में प्रयोग करते हैं. उनका यह भी कहना है कि उनकी दुकान की मीठी चटनी और अमचूर की चटनी का स्वाद शायद ही कहीं और मिल पाए. इसी विशेषता के चलते जवान से लेकर बुजुर्ग तक उनकी दुकान से वास्ता बनाए हुए हैं.

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1958 से शुरू दुकान का जलवा आज भी कायम है

अब इन वैष्णव चाट वालों के बारे में भी जान लें. इस दुकान को वर्ष 1958 में बिशनलाल ने शुरू किया था. उसके बाद जिम्मेदारी उनके बेटे डालचंद ने संभाल ली. उसके बाद यह काम उनके बेटे ललित के पास आ गया. अब वह और उनके दो बेटे (चौथी पीढ़ी) मयंक और धैर्य लोगों को चटपटा स्वाद परोस रहे हैं. उनका कहना है कि हमने कभी भी क्वॉलिटी से समझौता नहीं किया, इसलिए इतने सालों बाद भी उनके व्यंजन लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं. इस दुकान पर दोपहर 12 बजे माल बिकना शुरू होता है और रात 10 बजे तक लोग चटपटे व्यंजनों का लाभ उठाते हैं. चूंकि सोमवार को इस इलाके में साप्ताहिक अवकाश होता है, इसलिए इस दिन यह दुकान बंद रहती है.

नजदीकी मेट्रो स्टेशन: विश्वविद्यालय



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