दिलीप कुमार से जुड़ी यादें: शर्मिला टैगोर ने कहा-दास्तान की शूटिंग के समय दिलीप कुमार के साथ बैडमिंटन खेलती थी, पद्मिनी कोल्हापुरे बोलीं-उनकी एक्टिंग देख मैं अपनी लाइनें भूल जाती थी

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15 मिनट पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय

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बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार 98 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में अपनी अंतिम सांसें लीं। दिलीप साहब ने फिल्म ‘ज्वार भाटा’ (जो कि 1944 में रिलीज हुई थी) से अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी। दैनिक भास्कर से बात चीत के दौरान उनके कुछ चाहने वालों ने उनके बारे में खास बातें शेयर की हैं। आईये जाने कि वो क्या हैं-

‘दास्तान’ की शूटिंग के समय उनके साथ बैडमिंटन खेलती थी: शर्मिला टैगोर

मैंने उनके साथ एक ही फिल्म ‘दास्तान’ में काम किया है, पर उनकी बहनों के साथ मेरी अच्छी दोस्ती थी। मैं उनके भाई को भी जानती थी, उनके घर मेरा आना-जाता लगा रहता था। जब कभी-कभी वो मुझे मिलते थे, तब वो बहुत प्यार से बात करते थे। उनके साथ की यादें बहुत सारी हैं। आज उनके न रहने पर मुझे उनकी बहुत याद आ रही है। वे बहुत अच्छे एक्टर थे और वो एक्टिंग पर ज्यादा ध्यान देते थे, उनका पैसों की तरफ उतना ध्यान नहीं रहता था। वो एक वक्त पर एक ही फिल्म करते थे, कभी दो फिल्में एक साथ नहीं करते थे। जबकि उनके साथ काम करने वाली हिरोइनें दो से तीन फिल्मों में एक साथ काम करती थीं। वे डेट कैसे मैनेज करती थीं, वह मुझे नहीं पता, लेकिन उनका काम करने का यही तरीका था। उनकी डायलॉग डिलीवरी में भी एक खासियत थी। सब चाहते थे कि वे दिलीप कुमार जैसे डायलॉग बोलें, पर उनकी स्टाइल को कोई कॉपी नहीं कर पाया।

दिलीप साहब अपनी फैमिली से बहुत प्यार करते थे। वो अपनी पूरी फैमिली के साथ ही रहते थे। उन्होंने अपनी फैमिली के लिए बहुत कुछ किया। वो इंडस्ट्री के लिए भी बहुत कुछ करते थे जैसे जब कोई हादसा हो या क्रिकेट मैच हो तब वो फंड रेज करते थे। उसमें भी वो बहुत एक्टिव रहते थे और सबके प्रति हमदर्दी रखते थे। यह सोशल मीडिया के पहले की बात है। जब उनकी फिल्म देखने के लिए लंबी लाइन लगती थी। उनकी ‘मधुमती’ जैसी तमाम फिल्में हैं, जो कभी भुलाई नहीं जा सकती। मैं दिलीप साहब के साथ जब फिल्म ‘दास्तान’ कर रही थी, तब हमने बी.आर चोपड़ा के घर की बाउंड्री के अंदर इनडोर बैडमिंटन कोर्ट बनाया था। यूसुफ साहब वहां बैडमिंटन खेलते थे। कभी-कभी मुझे भी खेलने के लिए बुलाते थे। वो बहुत अच्छे प्लेयर थे। उन्हें एक्सरसाइज करना और चेस खेलना बहुत पसंद था। उनका फिल्मों के साथ-साथ बाकी चीजों में भी इंटरेस्ट था। उन्हें हर चीज के बारे में नॉलेज थी। वो हर विषय पर बात कर सकते थे और हर चीज में दिलचस्पी रखते थे। वे जब बात करते थे, तब हम सब सुनते रह जाते थे। साहब हमारी इंडस्ट्री के सबसे इंपोर्टेंट पार्ट थे। उनका करियर दशकों तक चला। अफसोस है कि काफी समय से उनकी तबियत ठीक नहीं थी। यह खबर सुनने के बाद मैंने सायरा जी को मैसेज किया है। वे बहुत अच्छी हैं। नवाब साहब के इंतकाल के बाद यूसुफ साहब ने मुझे खत लिखा था। वह बहुत खूबसूरत खत था। आज भी मैंने उस खत को संभाल कर रखा है।

उन्हें परफॉर्म करते देख मैं अपनी लाइनें ही भूल जाती थी: पद्मिनी कोल्हापुरे

दिलीप साहब के बारे में मैं क्या कहूं। उनके जाने से मैं बहुत दुखी हूं। अगर उनके बारे में बात करना शुरू करूं, तो अपने आपको रोक ही नहीं पाऊंगी। मैं बस यही कहूंगी कि उनके जाने से हमारी इंडस्ट्री को बहुत बड़ा लॉस हुआ है और उनके चाहने वालों को बहुत सदमा लगा है। मुझे बेहद अफसोस हो रहा है, मेरी पूरी जर्नी में उनका बहुत बड़ा हाथ है, क्योंकि उनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है। मैं उनसे बहुत प्यार करती थी, वे भी मुझे बहुत प्यार करते थे। हम जब भी मिलते थे, तब बड़े प्यार से मिलते थे। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। सायरा जी, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी उन पर अर्पण कर दी, भगवान उनको यह दुख सहने की ताकत दे। उनके लिए भी यह बहुत बड़ा लॉस है।

उस समय जब कैमरा शुरू होता था, तब वे जिस तरह से कैमरे के सामने परफॉर्म करते थे, वह देखकर सब दंग रह जाते थे। वो फिल्म ‘आग का दरिया’ में मेरे पिता बने थे। मैं ‘मजदूर’ में भी उनके साथ काम कर चुकी हूं, पर कई बार तो मैं उन्हें परफॉर्म करते देख अपनी लाइनें ही भूल जाती थी। ऐसा एक-दो नहीं, बल्कि कई बार हुआ है। वो इस बात को बड़े प्यार से समझाते भी थे। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा है।

‘गोपी’ के एक सीन के लिए, कई दिनों तक गुजरात के एक गांव में भेष बदलकर रहे थे दिलीप साहब: रजा मुराद

दिलीप साहब एक एक्टर नहीं बल्कि एक्टिंग के इंस्टीटूशन थे। ऐसा कोई एक्टर नहीं है हमारे देश का जो ये कहे कि मैं कभी ना कभी एक्टिंग करते वक्त दिलीप साहब से प्रभावित नहीं हुआ। वो अभिनय नहीं बल्कि तपस्या करते थे, वो अपने हर किरदार में रम जाते थे। वो अपने काम में इतने डेडिकेटेड थे कि फिल्म ‘कोहिनूर’ के लिए उन्होंने सितार बजाना सीखा था। दरअसल, फिल्म के शॉट में उन्हें सितार बजाना था, जिसके लिए उन्होंने शुरूआत में शॉट देने से इंकार कर दिया। उनका मानना था कि वे जब तक सितार सही से बजाना नहीं सीखेंगे, तब तक वे शॉट नहीं देंगे। फिर उन्होंने बाकायदा कुछ दिनों में सितार बजाना सीखा और वो शॉट दिया। इसी तरह, फिल्म ‘गोपी’ में वे एक किरदार कर रहे थे, जिसमें उन्हें एक मंदिर में मंजीरा बजाना होता था। उसे सिखने के लिए वे गुजरात के एक गांव में कई दिनों तक भेस बदलकर रहे। उन्होंने वहां मंदिर में पुजारियों से मंजीरा बजाना सीखा। मंजीरा सीखने के बाद उन्होंने फिल्म के लिए शॉट दिया था।

दिलीप साहब को अपने काम से प्यार था और पैसे से नहीं। अपने इतने लम्बे करियर में उन्होंने लोगों की उम्मीद से बहुत कम फिल्में की। वो उस दौर के एक्टर्स से कहते कि ‘ना’ कहना सीखो। यदि फिल्म या स्क्रिप्ट नहीं पसंद हो, तो उसे मत करो। कई प्रोडयूसर्स उनके पास पैसे भर-भर के लाते थे, लेकिन यदि उन्हें स्क्रिप्ट नहीं पसंद आती, तो वो उसे इंकार कर देते थे। वो एक वक्त में एक फिल्म करते थे, उनका पूरा ध्यान एक ही फिल्म में होता था। वो एक्टिंग के भीष्म पितामह थे और एक्टिंग में उनका मुकाबला किसी से नहीं हो सकता। उन्हें एक खिताब मिला था- शहनशाह-ए-जज्बात। ओवर एक्टिंग के दौर में नेचुरल एक्टिंग क्या होती है, वो दिलीप साहब से कोई सीखे। उनके जैसा एक्टर दुबारा नहीं बन सकता।

‘सौदागर’ के सेट पर रात के ढाई बजे डॉयलाग पर काम कर रहे थे दिलीप साहब: मुकेश खन्ना

हमने हमारा कोहिनूर खो दिया है। फिल्म ‘सौदागर’ में मैंने उनके बेटे का किरदार निभाया था। यकीन मानिये, मैंने इस फिल्म के लिए शुरूआत में इंकार कर दिया था, क्योंकि एक तरफ दिलीप साहब थे तो दूसरी तरफ राज कुमार। इनके साथ काम करना बहुत बड़ी बात होती थी और मैं उस वक्त ये सोचकर मना कर दिया कि मैं इनके साथ कैसे काम करूंगा। उस वक्त सुभाष घाई ने मुझे कहा की इतना मुश्किल नहीं है इन दोनों के साथ काम करना जितना मैं सोच रहा था और हुआ भी वही। दिलीप साहब भले ही उस वक्त के लीजेंडरी एक्टर थे, लेकिन ये बात वो कभी अपने चेहरे पर झलकने नहीं देते। जिस तरह से वे लोगों से बात करते, वो अपने आप में एक आकर्षण होता था। लोगों से ऐसे बात करते जैसे उन्हें वे सदीयों से जानते हों। चाहे अनजान आदमी ही क्यों ना हो, उनका बात करने का तरीका किसी का भी मन मोह लेता था।

मुझे याद है फिल्म ‘सौदागर’ के सेट पर एक रात 2:30 बजे वे होटल के कॉरिडोर में घूम रहे थे। दूसरे दिन सुभाष घाई ने मुझे इस किस्से के बारे में बताया था। उस वक्त दिलीप साहब थोड़े नर्वस थे और इसकी वजह थी राज कुमार। खुद इतने बड़े एक्टर होने के बावजूद, राज कुमार के साथ या उनके सामने सीन परफॉर्म करना उनके लिए टेंशन वाली बात थी। वो अपने इमेज को लेकर बहुत कॉन्शियस थे, वो राज कुमार के सामने फीके नहीं पड़ना चाहते थे। रात के ढाई बजे भी वो होटल के कॉरिडोर में डायलॉग डिलीवरी पर काम कर रहे थे। उन्होंने उस रात सुभाष घाई को कॉल किया था और अपने डायलॉग सुनाए थे। उस वक्त सुभाष जी ने उन्हें सो जाने की सलाह दी थी।

साथ ही दिलीप साहब को खाने का बहुत शौक था। उन्हें खुली वादीयों में बैठकर खाना खाने का बहुत शौक था। कई बार तो वो सायरा जी (सायरा बानू) से डरकर छुप छुपकर खाना खाते थे। वो खाने के इतने शौकीन थे कि वे दोनों हाथों का इस्तेमाल करते थे।

दिलीप साहब के लिए एक्टिंग का मतलब होता था, कुछ ना कहकर भी सब कुछ कह जाना: रमेश सिप्पी

फिल्म ‘शक्ति’ के दौरान, मुझे उनके किसी भी सीन को डाइरेक्ट करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। हर सीन में वे अपना बेस्ट देते और बतौर निर्देशक मुझे उनका हर एक परफॉरमेंस अच्छा लगता था। फिल्म में एक तरफ दिलीप साहब तो दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन थे। मुझे याद है कि एक सीन था जहां इन दोनों एक्टर्स को परफॉर्म करना था। उस सीन को डायरेक्ट करना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि दोनों ही लीजेंडरी एक्टर्स थे और वो सीन बहुत इमोशनल था। स्क्रिप्ट में कई सारे डायलॉग्स थे, लेकिन दिलीप साहब ने अपने इमोशंस से ही पूरा सीन खत्म कर दिया। उन्होंने अपनी आंखों से ही सीन में अपने हावभाव एक्सप्रेस कर दिए थे। उन्होंने कम शब्दों में ही बाप-बेटे का वो सीन पूरा लिया था। उस समय ज्यादा डायलॉग की उन्हें जरूरत ही नहीं पड़ी थी। शूट शुरू होने से पहले मुझे लगा था कि कई सारे री-टेक लेने पड़ेंगे, लेकिन सिर्फ एक टेक में सीन परफेक्ट शूट हो गया था। दिलीप साहब के लिए एक्टिंग का मतलब होता था कुछ ना कहकर भी सब कुछ कह जाना।

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