तन बादल मन बादल ये नन्हें हाथ-पांव बादल! विश्व पर्यावरण दिवस पर केदारनाथ सिंह की ‘पानी की प्रार्थना’

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आज पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस (World environment Day) मना रही है. सोशल मीडिया पर लोग बढ़ते जलवायु परिवर्तन और कंकरीट के जंगलों में दफ़न होती हरियाली, पक्षियों का कलरव और खत्म होते पानी के स्रोतों पर चिंता जता रहे हैं.

हमारे कवि और साहित्यकार सदियों से ही प्रकृति की उपयोगिता और इसके आकूत दोहन के दुष्परिणामों को समय-समय पर शब्द देते रहे हैं. हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यकार केदारनाथ सिंह (Kedarnath Singh) ने अपने कविता संग्रह ‘पानी की प्रार्थना’ (Pani Ki Prarthana) में आग, पानी, हवा और पेड़-पौधों के जीवन में महत्व को बड़े ही सुंदर ढंग से उकेरा है.

पानी

मैं घोषित करता हूं

कि पानी

मेरा धर्म है

आग मेरा वेदान्त

हवा से मैंने दीक्षा ली है

घास-पात मेरे सहपाठी

रास्ता मेरा देवता है

मकई मेरा कल्पवृक्ष

भागड़नाला मेरी गंगा

इस तरह यह वृद्ध शिशु

दुनिया के चौराहे पर

खड़ा है चंगा।

नदी का स्मारक

अब वह सूखी नदी का

एक सूखा स्मारक है

काठ का एक जर्जर पुराना ढाँचा—

जिसे अब भी वहाँ लोग

कहते हैं ‘नाव’

जानता हूँ—लोगों पर उसके

ढेरों उपकार हैं

पर जानता यह भी हूँ कि उस ढाँचे ने

बरसों से पड़े-पड़े

खो दी है अपनी ज़रूरत

इसलिए सोचा

अबकी जाऊँगा तो कहूँगा उनसे—

भाई लोगो,

काहे का मोह

आख़िर काठ का पुराना ढाँचा ही तो है

सामने पड़ा एक ईंधन का ढेर—

जिसका इतना टोटा है!

वैसे भी दुनिया

नाव से बहुत आगे निकल गई है

इसलिए चीरकर-फाड़कर

उसे झोंक दो चूल्हे में

यदि नहीं

तो फिर एक तखत या स्टूल ही बना डालो उसका

इस तरह मृत नाव को

मिल जाएगा फिर से एक नया जीवन…

पर पूरे जतन से

उन शब्दों को सहेजकर

जब पहुँचा उनके पास

उन आँखों के आगे भूल गया वह सब

जो गया था सोचकर

‘दुनिया नाव से आगे निकल गई है’—

यह कहने का साहस

हो गया तार-तार

वे आँखें

इस तरह खुली थीं

मानो कहती हों—

काठ का एक जर्जर ढाँचा ही सही

पर रहने दो ‘नाव’ को

अगर वह वहाँ है तो एक न एक दिन

लौट आएगी नदी

जानता हूँ

वह लौटकर नहीं आएगी

आएगी तो वह एक और नदी होगी

जो मुड़ जाएगी कहीं और

सो, चलने से पहले

मैंने उस जर्जर ढाँचे को

सिर झुकाया

और जैसे कोई यात्री पार उतरकर

जाता है घर

चुपचाप लौट आया।

बादल ओ!

हम नए-नए धानों के बच्चे

तुम्हें पुकार रहे हैं

बादल ओ! बादल ओ! बादल ओ!

हम बच्चे हैं,

चिड़ियों की परछाईं पकड़ रहे हैं उड़-उड़,

हम बच्चे हैं,

हमें याद आई है जाने किन जनमों की,

आज हो गया है जी उन्मन!

तुम कि पिता हो!

इन्द्रधनुष बरसो

कि फूल बरसो

कि नींद बरसो!

बादल ओ!

हम कि नदी को नहीं जानते!

हम कि दूर सागर की लहरें नहीं माँगते!

हमने सिर्फ़ तुम्हें जाना है,

तुम्हें माँगते हैं!

आद्र्रा के पहले झोंके में

तुमको सूँघा है,

पहला पत्ता बढ़ा दिया है!

लिये हाथ में हाथ हवा का

संध्या की मेड़ों पर घिरते तुमको देखा है,

होंठों से विवश छू लिया है!

ओ सुनो, बीजवर्षी बादल!

ओ सुनो, अन्नवर्षी बादल!

हम पंख माँगते हैं!

हम नए फेन के उजले-उजले

शंख माँगते हैं!

हम बस कि माँगते हैं

बादल! बादल!

घर बादल

आँगन बादल

सारे दरवाज़े बादल!

तन बादल

मन बादल

ये नन्हे हाथ-पाँव बादल!

हम बस कि माँगते हैं

बादल! बादल!

कवि और साहित्यकार सदियों से ही प्रकृति की उपयोगिता और इसके आकूत दोहन के दुष्परिणामों को समय-समय पर शब्द देते रहे हैं.

जब वर्षा शुरू होती है

जब वर्षा शुरू होती है

कबूतर उड़ना बन्द कर देते हैं

गली कुछ दूर तक भागती हुई जाती है

और फिर लौट आती है

मवेशी भूल जाते हैं चरने की दिशा

और सिर्फ़ रक्षा करते हैं उस धीमी गुनगुनाहट की

जो पत्तियों से गिरती है

सिप् सिप् सिप् सिप्…

जब वर्षा शुरू होती है

एक बहुत पुरानी-सी खनिज-गन्ध

सार्वजनिक भवनों से निकलती है

और सारे शहर पर छा जाती है

जब वर्षा शुरू होती है

तब कहीं कुछ नहीं होता

सिवा वर्षा के

आदमी और पेड़

जहाँ पर खड़े थे वहीं पर खड़े रहते हैं

सिर्फ़ पृथ्वी घूम जाती है उस आशय की ओर

जिधर पानी के गिरने की क्रिया का रुख़ होता है।

नदी

अगर धीरे चलो

वह तुम्हे छू लेगी

दौड़ो तो छूट जाएगी नदी

अगर ले लो साथ

वह चलती चली जाएगी कहीं भी

यहाँ तक- कि कबाड़ी की दुकान तक भी

छोड़ दो

तो वही अंधेरे में करोड़ों तारों की आँख बचाकर

वह चुपके से रच लेगी

एक समूची दुनिया

एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है

कि तुम कहीं भी रहो

तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी

प्यार करती है एक नदी

नदी जो इस समय नहीं है इस घर में

पर होगी ज़रूर कहीं न कहीं

किसी चटाई

या फूलदान के नीचे

चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना

जब सारा शहर सो जाए

तो किवाड़ों पर कान लगा

धीरे-धीरे सुनना

कहीं आसपास

एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह

सुनाई देगी नदी!
(अकाल में सारस)

किताब : पानी की प्रार्थना
लेखक : केदारनाथ सिंह
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ संख्या : 167
मूल्य : 160/- (पेपरबैक)



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