डे-ड्रीमिंग भी थैरेपी: रिसर्च में दावा- सही समय, पाॅजिटिव साेच और रोचक आइडिया हो तो विचारों में खो जाना भी अच्छा

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43 मिनट पहलेलेखक: मेलिंडा वेनर माेयर, न्यूयॉर्क टाइम्स

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ज्यादातर लाेग अपने भीतर साेच-विचार की प्रक्रिया से बचते हैं। यहां तक कि वे इसकी बजाय तकलीफ सहना भी पसंद कर लेते हैं। एक स्टडी के अनुसार अपने भीतर विचार मंथन से बचने का एक कारण यह है कि हम साेच-विचार की प्रक्रिया को कम आंकते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लाेरिडा के डे-ड्रीमिंग और बाेरडम पर स्टडी कर रहीं डाॅ. एरिन वेस्टगेट का कहना है कि विचाराें में खाे जाना (डे-ड्रीमिंग) एक तरह की थैरेपी है। यह हमारे लिए फायदे का साैदा बन सकती है, अगर साेच-विचार काे सही दिशा और परिस्थतियां दें। खास तरह से डे-ड्रीमिंग करें ताे यह हमें स्थिरता, खुशी देता है और ज्यादा क्रिएटिव बनाता है। समस्याओं के समाधान में भी इसके अच्छे नतीजे मिले हैं।

सही समय और स्थान: डाॅ. वेस्टगेट का कहना है कि ऐसा समय विचाराें में खाेने के लिए सबसे सही है। जब आप काेई ऐसा काम कर रहे हाें जिसमें मानसिक रूप से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत नहीं हाे, तो आप उस समय भीतर के विचाराें पर फोकस करें। जैसे कि बागवानी, वाॅक या ब्रश करते हुए ऐसा किया जा सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी न करें और सिर्फ दिन में सपने देखते रहें। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफाेर्निया के जाेनाथन शूलर का कहना है कि छाेटे-माेटे काम करते समय डे-ड्रीमिंग ज्यादा आसान है।

पाॅजीटिव साेचें: डाॅ. वेस्टगेट का कहना है कि पाॅजिटिव साेचें। अपने विचारों को नियंत्रित करें, जैसे कि अच्छी यादाें के बारे में। भविष्य में हाेने वाली किसी घटना के बारे में जिसका इंतजार हाे या उन लोगों के बारे में जिनकी आप फिक्र करते हाें।

राेचक आइडिया पर काम करें: डाॅ. शूलर का कहना है कि विचारों में दिलचस्प आइडिया पर फोकस करने से क्रिएटिविटी बढ़ती है। किसी समस्या का हल खाेजने में लगे लाेग ब्रेक लेेकर काेई और छाेटा-माेटा काम करते हुए ज्यादा रचनात्मक हल खाेजने में सफल रहते हैं। चुपचाप बैठे हुए सोचते रहने या काेई जटिल काम करने या ब्रेक न लेने से समस्या का हल और मुश्किल हाे जाता है।

डे-ड्रीमिंग से याददाश्त बेहतर होती है

विशेषज्ञों के अनुसार, इंसान अपने जागने के समय का 47% डे-ड्रीमिंग में बिताता है। आसपास की चीजों से हटकर विचार वैक्यूम में भटकने लगते हैं। ये सही दिशा में होने से मेमोरी बेहतर होती है और मल्टीटास्किंग में आसानी होती है। हमेशा पॉजिटिव रह सकते हैं।

जर्मनी में यूनिवर्सिटी ऑफ टूबिनजेन की मनाेवैज्ञानिक के मुरायामा का कहना है कि वयस्काें से अनुमान करने काे कहा गया कि शांत कमरे में अकेले बैठना उनकाे कितना पसंद आएगा। उसके बाद उनकाे 20 मिनट इस तरह से बैठने काे कहा गया। उनकाे अनुमान से ज्यादा खुशी महसूस हुई।

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