जूडो प्लेयर सुशीला देवी का इंटरव्यू: ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई करने पर कहा- भारत में प्रतिभा की कमी नहीं, ज्यादा कॉम्पिटिशन मिले तो मेडल जीतने में भी सक्षम

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नई दिल्ली4 मिनट पहले

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भारतीय जूडो खिलाड़ी सुशीला देवी टोक्यो ओलिंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करने वाली इकलौती खिलाड़ी हैं। उन्होंने एशियाई कोटे से ओलिंपिक के लिए 48 किलोग्राम कैटेगरी में क्वालीफाई किया है। उनकी एशियाई रैंकिंग 7 है। इसी वजह से उन्हें ओलिंपिक कोटा मिला।

सुशीला का मानना है कि भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन भारतीय जूडो खिलाड़ियों को बहुत ज्यादा कॉम्पिटिशन नहीं मिल पाता। अगर उन्हें कॉम्पिटिशन मिले, तो ओलिंपिक कोटा हासिल करने वाले खिलाड़ियों की संख्या बढ़ेगी। साथ ही भारत के लिए ज्यादा से ज्यादा मेडल जीत सकेंगे।

सुशीला फ्रांस में पिछले एक महीने से अपने कोच जीवन शर्मा के मार्गदर्शन में ट्रेनिंग कर रही हैं। उन्होंने 2014 में कॉमनवेल्थ गेम्स में देश के लिए सिल्वर मेडल जीता था। भास्कर ने टोक्यो ओलिंपिक की तैयारी और जूडो का भारत में भविष्य को लेकर सुशीला से बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश…

सवाल: आप और 6 बार की वर्ल्ड चैंपियन बॉक्सर मेरीकॉम मणिपुर से हैं। आप जूडो में कैसे आईं?
जवाब : मेरीकॉम दीदी हमारी आदर्श हैं। उनकी तरह मैं देश के लिए वर्ल्ड चैंपियनशिप और ओलिंपिक में मेडल जीतना चाहती हूं। जूडो मुझे बचपन से ही काफी पसंद था, क्योंकि जूडो को लेकर हमारे घर में पारिवारिक माहौल था। मेरा बड़ा भाई जूडो की ट्रेनिंग करता था। वहीं मेरे चाचा जी भी जूडो खेलते थे। इसलिए उन्हें देखकर मैंने भी जूडो की ट्रेनिंग शुरू की।

2007 से 2010 में मणिपुर में ही स्थित स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में देवेंद्र सर और सावित्री मैम की निगरानी में ट्रेनिंग की। उसके बाद 2010 से पटियाला में कोच जीवन शर्मा की निगरानी में ट्रेनिंग कर रही हूं।

सवाल : आपको यहां तक के सफर में किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जवाब : हमारी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। मेरे पिता प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते हैं, मां हाउस वाइफ थीं। कई बार कॉम्पिटिशन के लिए अपने शहर से बाहर जाने के लिए भी हमारे पास पैसे नहीं होते थे। यही नहीं इवेंट के मुताबिक मुझे डाइट भी नहीं मिल पाती थी।

स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) के हॉस्टल में आने के बाद डाइट से लेकर हर चीज की समस्या से छुटकारा मिला। वहीं सीनियर लेवल पर आने के बाद मुझे JSW की ओर से भी सपोर्ट मिला। भारत सरकार की ओर से भी स्कॉलरशिप मिलने लगी और हर प्रकार की सुविधा मिलने लगी।

सवाल : टोक्यो की ट्रेनिंग आपकी कैसी चल रही है और आगे का क्या प्लान है?
जवाब : मैं पिछले एक महीने से फ्रांस में ट्रेनिंग कर रही हूं। टोक्यो ओलिंपिक से पहले दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में एक हफ्ते का कैंप लगेगा। मैं 9 जुलाई को भारत वापस लौट रही हूं। दिल्ली में एक हफ्ते की ट्रेनिंग के बाद जापान के लिए रवाना हो जाऊंगी।

सवाल : आप ओलिंपिक में क्या उम्मीद कर रही हैं?
जवाब: टोक्यो ओलिंपिक में मैं जूडो में पहली बार देश का प्रतिनिधित्व कर रही हूं। हम भारतीयों के लिए इस इवेंट में क्वालीफाई करना ही मुश्किल होता है। हमारे लिए पहला लक्ष्य इस खेल में क्वालीफाई करना होता है। हमारी तैयारी बेहतर है, लेकिन अनुभव की कमी है। मेरा लक्ष्य अपना बेस्ट देना है।

सवाल : ओलिंपिक में क्वालीफाई करना भारतीय खिलाड़ियों के लिए चुनौती क्यों है? क्या भारत में प्रतिभा की कमी है?
जवाब : भारत में भले ही जूडो लोकप्रिय नहीं है, लेकिन जापान, चीन, फ्रांस और एशिया के कई देशों में यह काफी लोकप्रिय है। ऐसा नहीं है कि भारत में प्रतिभा की कमी है, बल्कि भारतीय जूडो खिलाड़ियों को ज्यादा कॉम्पिटिशन ही नहीं मिल पाता है।

मेरा मानना है कि भारतीय खिलाड़ियों को जूनियर लेवल से ही कॉम्पिटिशन के लिए विदेशों में भेजना चाहिए। इससे हमें एक्सपीरियंस मिलेगा। हां कुछ सालों में हालात बदले हैं, अब एसोसिएशन और SAI की ओर से इस खेल को बढ़ावा देने के लिए पूरा सपोर्ट किया जा रहा है।

सवाल : 2014 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड के बाद मेडल के लिए आपको काफी इंतजार करना पड़ा रहा। ऐसा क्यों?
जवाब : मैं इंजर्ड हो गई थी। इस वजह से मुझे बाहर रहना पड़ा। हालांकि, 2018 एशियन गेम्स के लिए मैंने पूरा जोर लगा दिया था, लेकिन ट्रायल के दौरान फिर इंजर्ड हो गई। इस वजह से मैं एशियन गेम्स के लिए ट्रायल में सिलेक्ट नहीं हो पाई। रिकवर होने के बाद फिर से मैंने प्रैक्टिस शुरू की। कोच जीवन शर्मा सर ने इस दौरान मेरा पूरा सपोर्ट किया। मैंने फिर से नेशनल चैंपियनशिप में भाग लेकर ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई किया।

सवाल : कोरोना के दौरान किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
जवाब : कोरोना के दौरान ट्रेनिंग करना एक बड़ा चैलेंज था। उस दौरान बिना पाटर्नर के ट्रेनिंग करनी पड़ी। वहीं बाहर के लोगों के संपर्क में भी नहीं आ सकते थे। हमेशा डर रहता था कि किसी संपर्क में आने से कोरोना संक्रमित न हो जाएं। मैं पिछले कई महीने से घर भी नहीं जा सकी हूं।

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