जयेशभाई जोरदार से अटैक तक, जानें क्यों देखनी चाहिए 2022 की ये 8 फ्लॉप फिल्में

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साल 2022 बॉलीवुड लवर्स के लिए कुछ खास साबित नहीं हुआ। इस साल द कश्मीर फाइल्स, गंगूबाई काठियावाड़ी और भूल भुलैया जैसी गिनी चुनी बॉलीवुड फिल्में ही बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल कर सकीं। जबकि कई अन्य फिल्मों को  दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। अजीबोगरीब या दुख की बात तो ये रही कि फिल्म को बिना देखे ही उसके खिलाफ ट्रेंड किए जाने लगे और इस सोशल मीडिया की आंधी में कई अच्छे फिल्मों भी धुआं हो गईं। इस रिपोर्ट में आपको 2022 की ऐसी 8 फिल्मों के बारे में बताते हैं, जो बॉक्स ऑफिस पर हिट नहीं हुईं, लेकिन आपको उन्हें देखना चाहिए।

शाबाश मिथु: बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू की फिल्म शाबाश मिथु को भारतीय महिला क्रिकेट खिलाड़ी मिताली राज की हैगियोग्राफी कह सकते हैं। फिल्म में मिताली राज की कहानी को काफी खूबसूरती से दिखाया गया था। हो सकता है कि बतौर दर्शक आपको फिल्म में कई कमियां नजर आएं लेकिन मिताली राज के लिए आपको इस फिल्म को देखना चाहिए। फिल्म देखने के बाद आप महिला क्रिकेट और बतौर महिला क्रिकेटर मिताली का स्ट्रगल देखने को मिलेगा।

रॉकेट्री- द नम्बि इफेक्ट: यह फिल्म भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजीनियर नंबी नारायणन की जिंदगी पर आधारित है। नारायणन पर जासूसी का आरोप लगाया गया था। बतौर भारतीय नंबी नारायणन के बारे में आपको जरूर जानना चाहिए। नंबी नारायणन ने हमारे देश के लिए जो भी किया है, वो फिल्म ‘रॉकेट्री- द नम्बि इफेक्ट’में दिखाया गया है। इस फिल्म का निर्देशन आर माधवन ने किया है। वहीं नंबी के किरदार में भी माधवन ही हैं।  यह फिल्म हिंदी, अंग्रेज़ी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और कन्नड़ में रिलीज हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक करीब 60 करोड़ के बजट में बनी फिल्म 20 करोड़ के आसपास ही कमाई कर पाई।

जनहित में जारी: नुसरत भरूचा की फिल्म जनहित में जारी भले ही कहानी के साथ ही तकनीकी तौर पर कमजोर फिल्म साबित होती है। लेकिन ये फिल्म एक दमदार मैसेज देती है। जनहित में जारी फिल्म समाज के उस नजरिए को दिखाती है, जो आज भी सेक्स और उससे जुड़े मुद्दें पर देखने को मिलती है। जनहित में जारी फिल्म में नुसरत ने एक सेल्स गर्ल का किरदार निभाया था, जो कंडोम कंपनी में काम करती है। ऐसे में न सिर्फ समाज बल्कि परिवार से भी क्या कुछ झेलना पड़ता है इसे फिल्म में दिखाया गया है। वहीं फिल्म में भ्रूण हत्या का टॉपिक भी उठाया है।

जयेशभाई जोरदार: रणवीर सिंह की फिल्म जयेशभाई जोरदार को कुछ दर्शकों ने सिरे से नकार दिया, और धीरे- धीरे निगेटिव माउथ पब्लिसिटी के चलते फिल्म को बड़े लेवल पर इग्नोर किया गया। फिल्म जयेशभाई जोरदार में कन्या भ्रूण हत्या के मुद्दे पर रोशनी डाली गई। फिल्म में दिखाया गया था कि आज भी कैसे समाज में पुरुष प्रधानता कितनी हावी है और कैसे आज भी कई लोगो के दिमाग में ये सोच है कि सिर्फ लड़का ही उनके परिवार को आगे ले जा सकता है।

जर्सी: फिल्म जर्सी एक ऐसे शख्स की खूबसूरत कहानी है, जो एक पिता और पति की जिम्मेदारियों के बीच फंसा है। कई मजबूरियों के बाद भी शख्स अपने बेटे की हर इच्छा पूरी करना चाहता है। फिल्म कई जगहों पर जरूर फीकी पड़ती है, जहां बतौर दर्शक आप सोचते हैं कि ऐसा करने की क्या जरूरत थी, लेकिन फिल्म के अंत तक आप उससे कनेक्ट कर जाते हैं।

अटैक पार्ट वन: जॉन अब्राहम की फिल्म अटैक पार्ट वन को मोटे तौर पर रोबोकॉप, यूनिवर्सल सोल्जर और कैप्टन अमेरिका जैसी फिल्मों की सस्ती कॉपी कह कर नकार दिया गया। ये बात बेशक सच है कि हॉलीवुड में हम इस तरह का एक्शन और करीब करीब ऐसी स्टोरी भी देख चुके हैं, लेकिन इंडियन सिनेमा में ऐसी शुरुआत होना वाकई काबिल-ए – तारीफ की बात है। जिन हॉलीवुड फिल्मों से इसकी तुलना हो रही थी, उनके बजट और अटैक के बजट में बहुत बड़ा अंतर था। जिस बजट में अटैक में बढ़िया एक्शन- वीएफएक्स का इस्तेमाल हुआ है, उस वजह से इस फिल्म को देखना बनता है।

झुंड: नागराज मंजुले  निर्देशित फिल्म भले ही थिएटर के लिए बोझिल लगी हो, लेकिन इसे ओटीटी पर जरूर एन्जॉय किया जा सकता है। फिल्म में समाज की आम सोच पर तीखा प्रहार किया गया है और फिल्म कई मायने में आपको झकझोरने में कामयाब भी दिखती है। फिल्म की कहानी एक दम आम है, जहां कुछ झुग्गी के बच्चों को फुटबॉल टीम बनाने के लिए बतौर कोच अमिताभ बच्चन उतरते हैं। हालांकि इस टीम के बनने और कोच के पर्सनल प्रोफेशनल लाइफ की परेशानियां समाज को आइना दिखाती हैं।

बधाई दो: आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग, लड़के को लड़के के साथ और लड़की को लड़की के साथ रिलेशनशिप में नहीं पचा पाता है। लेकिन बदलते वक्त के साथ, बदलती सोच के साथ अब धीरे धीरे ये समझना जरूरी हो गया है कि शारीरिक और मानसिक तौर पर सब एक जैसे नहीं हो सकते हैं। राजकुमार राव और भूमि पेडनेकर की फिल्म बधाई दो भी इस ही सोच को हलके अंदाज में बयां करती है कि कई बार समाज के लिए खुद को कैसे शख्स घेर लेता है और वो बनने में जुट जाता है जो वो है नहीं।

 



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