छठ की तरह तीन दिनों तक चलता है जितिया व्रत, ये कठिन व्रतों में से एक है, जानें कथा, शुभ मुहूर्त

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Jivitputrika Vrat 2021: संतान प्राप्ति, उनकी लंबी आयु और सुखमय जीवन के लिए हिंदू धर्म में महिलाओं द्वारा रखे जाने वाले व्रत को जितिया व्रत कहा जाता है. जितिया व्रत हर साल अश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है. इस दिन महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु, सुखमय जीवन और संतान प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. जितिया पर्व खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में धूम-धाम से मनाया जाता है. तीन दिनों तक चलने वाले इस व्रत को सभी व्रतों में सबसे कठिन व्रत माना गया है. इस बार जितिया पर्व 28-30 सितंबर तक मनाया जाएगा. जितिया व्रत में सप्तमी तिथि के दिन नहाए खाए, अष्टमी के दिन जितिया व्रत और नवमीं के दिन व्रत का पारण किया जाता है.
 
जितिया व्रत का महत्व (jitiya vrat significance )
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत का महत्व महाभारत से जुड़ा है. कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ में पल रहे पांडव पुत्र को बचाने के लिए श्री कृष्ण ने अपने सारे पुण्य कर्मों को लगा दिया था. और उसे पुनर्जीवित कर दिया था. तब से ही स्त्रियां कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखकर अपनी संतान की लंबी आयु की कामना करती हैं. कहते हैं कि इस व्रत से श्री कृष्ण भगवान प्रसन्न होकर व्रती स्त्रियों की संतान की रक्षा करते हैं. 

जितिया व्रत कथा (jitiya vrat katha)
जितिया की व्रत कथा पढ़ने भर से ही संतान को लंबी आयु का वरदान मिल जाता है. पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक पेड़ पर गुरुड़ और लोमड़ी रहते थे. दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा और उपवास करते देखा तो उनका भी जितिया व्रत करने का मन कर गया. दोनों ने भगवान श्री जीऊतवाहन की पूजा और व्रत करने का संकल्प लिया. लेकिन जिस दिन दोनों को व्रत रखना था, उस दिन गांव के एक बड़े व्यापारी की मृत्यु हो गई और उसके शव को देखकर लोमड़ी अपनी भूख पर काबू न पा सकी. और उसने चुपके से व्रत तोड़ते हुए भोजन कर लिया. दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया. परिणामस्वरुप, अगले जन्म में लोमड़ी से पैदा हुए सभी बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही मर जाते थे, और चील को एक-एक करके सात लड़के पैदा हुए. 

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