खास-बातचीत: सक्सेस पर प्रतीक गांधी बोले- थिएटर से सीखा कुछ भी परमानेंट नहीं होता, हर बार नई तालियां बटोरनी पड़ेगी

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मुंबई21 मिनट पहलेलेखक: उमेश कुमार उपाध्याय

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प्रतीक गांधी के करियर में ‘स्कैम 1992’ सीरीज मील का पत्थर साबित हुई। प्रतीक इस बार हार्दिक गुज्जर लिखित-निर्देशित अपनी अगली फिल्म ‘भवई’ को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने इस फिल्म को एक्सेप्ट और कैरेक्टर के लिए मेहनत-मशक्कत करने से लेकर गुजरात की फिल्मों, नाटकों में काम करने आदि के बारे में दैनिक भास्कर से खास-बातचीत की है।

यह फिल्म स्वीकारने के पीछे सबसे बड़ा रीजन क्या रहा?
सबसे बड़ा रीजन इसकी कहानी रही। मैं इस कहानी से रिलेट कर पाया, क्योंकि यह एक एक्टर की कहानी है, जो छोटे गांव का है। वह एक्टर बनना चाहता है। उसे स्टेज पर जाकर परफॉर्म करने का मौका मिलता है। वहां से उसकी जिंदगी में बदलाव आता है। मैंने 20 सालों तक थिएटर किया है, सो मेरे लिए इसे स्वीकारने का यह बहुत बड़ा कारण था। यह मेरी पहली हिंदी फिल्म थी। मेरे पास साल 2018 में इसका ऑफर आया था, तब हामी भरते हुए इसकी शूटिंग शुरू कर दी थी। उस समय मेरे पास इतने ज्यादा च्वाइसेस भी नहीं थी। खैर, इसकी बहुत अच्छी स्क्रिप्ट है। अगर ऐसी स्क्रिप्ट मिले, तब न कहने का कोई कारण ही नहीं बनता।

आप कैरेक्टर से रिलेट करते हैं। फिर थिएटर करने के दौरान क्या आपको भी किसी लड़की से प्यार हुआ?
जी हां, स्टेज पर परफॉर्म करने के दौरान मुझे भी लड़की से प्यार हुआ था। मुझे जिससे प्यार हुआ, आगे चलकर उसी के साथ शादी भी हुई। आज रियल लाइफ में वह मेरी पत्नी हैं। मेरी पत्नी भी थिएटर एक्टर हैं। हमारे बीच अच्छी दोस्ती रही है।

अपने किरदार के बारे में थोड़ा विस्तार से बताइएगा?
मेरे किरदार का नाम राजाराम जोशी है। वह गांव का एक सीधा-सादा लड़का है, जिसे एक्टर बनना है। उसके गांव में कभी नाटक नहीं हुआ है, सो उसे परफॉर्म करने का कभी मौका नहीं मिला। पहली बार उसके गांव में रामलीला की एक टोली आई है, जो परफॉर्म करती है। उस लड़के को लगता है कि पहली बार नाटक हो रहा है, तब मुझे भी मौका मिलेगा। वह काम मांगने जाता है। ‌वह कहता है कि मुझे राम बना दीजिए। लेकिन बाहर से आई टोली ने उसे रावण बनाकर पेश किया। वह लड़का इतने अच्छे से रावण का रोल निभाया कि ऑडियंस उसके साथ जुड़ गई। यहां से उसकी जिंदगी कैसे चेंजेस आया, यही कहानी है।

इस कैरेक्टर में ढलने के लिए क्या मेहनत-मशक्कत करनी पड़ी?
राजाराम गांव का सीधा-सादा लड़का है, उससे सहज जुड़ पाया। उसमें कोई दिक्कत नहीं हुई। लेकिन रामलीला के इस आर्ट फॉर्म में रावण की भूमिका के लिए लाउड एक्शन करना था। यह परफॉर्म ज्यादातर डांस-ड्रामा के रूप में किया जाता है। यहां पर युद्ध भी होता है, तब उसे डांस के थ्रू दिखाया जाता है। बहुत सारे डायलॉग गाकर बोलना पड़ता है। इसके अलावा बांण और तलवार चलाने की प्रैक्टिस भी नृत्य के फार्मेट में करना पड़ा। इसके लिए अच्छी-खासी प्रैक्टिस करनी पड़ी।

सक्सेस मिलने के बाद स्टार्स में एक चेंजेस आ जाता है या यूं कहिए कि सफलता सिर चढ़कर बोलने लगती है। लेकिन ऐसा आपके साथ नहीं हुआ। आखिर कैसे?
इसका कारण यही है कि मैं जिस घर से आ रहा हूं, जिस माहौल में पला-बढ़ा हूं, वह अलग रहा। एक टीचर की फैमिली से हूं। दूसरा यह है कि मुझे थिएटर ने इतने सालों से बांधकर रखा है। उसने यह भी सिखाया है कि यहां कुछ भी परमानेंट नहीं होता है। एक नाटक का एक शो बहुत अच्छा जाता है, जबकि दूसरा शो उतना अच्छा नहीं भी जाता है। अब पिछली तालियों को लेकर कब तक घूमेंगे। आखिर हर बार नई तालियां बटोरनी पड़ेगी।

आपके माता-पिता टीचर हैं। आपके जीवन पर उनका किस तरह से प्रभाव पड़ा? इस इंडस्ट्री में आने पर उनका क्या कहना था?
मेरे पिता ही नहीं, मेरी नानी फैमिली में सब शिक्षक थे। सभी साहित्य और संगीत जगत से जुड़े थे। जहां तक कला की बात है, सो घर में कला का माहौल बचपन से साधना के तौर पर देखा है। कला किसी के कमाई का जरिया बनेगा, ऐसा मुझे नहीं पता था। माता-पिता ने कभी ऐसा नहीं कहा कि तुम्हें टीचर, इंजीनियर बनना है। एक्टिंग लाइन में आने के दौरान मुझे घर से अच्छा सपोर्ट मिला।

बॉलीवुड में तेजी के साथ करियर बना रहे हैं। यह अच्छी बात है, पर गुजराती नाटक और फिल्मों से जुड़ाव किस तरह से सहेजकर रखेंगे?
मैं इसे बहुत ही सहेजकर रखना चाहूंगा। खैर, गुजराती नाटक तो कर ही रहा हूं। जब भी मौका मिलता है, स्टेज शोज कर ही लेता हूं। जहां तक फिल्मों का सवाल है, अभी टाइम मैनेजमेंट का हिसाब है। पहले मैं साल में दो-तीन गुजराती फिल्में कर लेता था, शायद अब डेढ़ साल में एक ही फिल्म कर पाऊंगा, क्योंकि दूसरे प्रोजेक्ट भी करने हैं। लेकिन एक बात बताऊं कि गुजराती नाटक और फिल्में छोड़ने वाला नहीं हूं। इसे जरूर करता रहूंगा।

अच्छा, आज गुजराती नाटक और फिल्मों की स्थिति पर क्या कहेंगे? खासकर, इसे आगे बढ़ने में खामी-कमी कहां पाते हैं?
मेरे ख्याल से गुजराती फिल्में धीरे-धीरे अच्छा कर रही हैं। अच्छे-अच्छे एक्सप्रेरिमेंट हो रहे हैं। ऑडियंस ने भी मेकर्स को बढ़ावा दिया है कि हम ऐसी नई कहानियां देखने के लिए तैयार हैं। अगर हम समय पर दर्शकों को अच्छी कहानियां और परफॉर्मेंस देना शुरू करें, तब यह एक बहुत अच्छा दौर शुरू हो सकता है। जहां तक थिएटर का सवाल है, तब अभी तो पूरी थिएटर इंडस्ट्री ही हिली हुई है। डेढ़ साल से नाटक नहीं हो रहे हैं। नाटक से जुड़े सभी कलाकार बैठे हुए हैं। मुझे लगता है कि यह दौर जल्दी गुजर जाएगा और सब अपने काम पर वापस लौटेंगे। हां, ऑडियंस को अगर कुछ भी दिखाना है, तब अच्छा ही दिखाना होगा।

अपने पसंदीदा गुजराती भोजन, पहनावा और जगह आदि चीजों के बारे में बताइए?
हमने अभी भवई को कच्छ, भुज में शूट किया। पहली बार भुज का गांव-गांव देखा। वह बहुत ही प्यारी और सुंदर जगह है। वहां के लोग बहुत प्यारे हैं। वे ऐसी मेहमान नवाजी करते हैं कि वहां से आने का मन ही नहीं करेगा। यह तो गुजरात का अलग ही मजा है। दूसरे खाने-पीने की बात है, तब गुजरात की थाली से लेकर हर जगह के गुजराती डिश का अपना अलग ही स्वाद है। मुझे तो गुजराती थाली बहुत पसंद आती है। मैं इसे गुजरात में कहीं भी जाकर खा सकता हूं। उंदियो, नमकीन, खांडवी आदि पसंद है। पहनावे में कुछ अलग रहा नहीं। हां, काठियावाड़ की तरफ जाएं, तब वहां खासकर जो पगड़ी पहनते हैं, वह मुझे बहुत प्यारी लगती है।

गुजरात का बड़ा त्योहार गरबा आ रहा है, क्या खास प्लान है?
जी हां, यह गुजरात का बहुत बड़ा त्योहार होता है। लेकिन इस बार लगता नहीं है कि बड़े ग्राउंड पर खेला जाएगा। हां, माताजी की आरती और गरबा खेलना बहुत पसंद है। हर साल इसका इंतजार करता हूं। इस बार नवरात्रि के दौरान शूटिंग कर रहा होऊंगा, सो गरबा में शामिल न होने पर मिस तो करूंगा। लेकिन परिवार के साथ होने पर दो वक्त आरती कर ही पाऊंगा।

आप महात्मा गांधी पर एक नाटक किया है। उनकी जयंती के अवसर पर बताएंगे कि उनका आपके जीवन पर क्या असर पड़ा है?
हां, इतने सालों से उन पर परफॉर्म करते आ रहा हूं, तब उनके चरित्र, सोच आदि को बहुत करीब से जाना। उनकी सबसे ज्यादा जो चीज प्यारी लगी है, वह उनका संयम है। जीवन में इतनी गलतियां करने के बाद उसे समझना और कबूल करना, लोगों तक पहुंचाना। उसके बाद महात्मा तक का सफर तय करना, यह छोटी बात नहीं है।

अच्छा, जब एक फिल्म या सीरीज सफल हो जाती है, तब उसी तरह के किरदार ऑफर होने लगते हैं। स्कैम 1992 सफल होने के बाद उस तरह के काफी ऑफर मिलने लगे होंगे?
सरप्राइज और खुश हूं कि मुझे उस प्रकार का किरदार वापस ऑफर नहीं हुआ। सच तो यह है कि स्कैम के बाद मेरे पास अलग-अलग तरह के किरदार और कहानियां ही आई हैं। मेरे लिए खुशी की बात है कि उसी ढांचे में न ढलकर अलग-अलग किरदार निभाने का मौका मिल रहा है।

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