क्या लगने लगा है आप किसी लायक नहीं? तो ये आप की कमी नहीं, इम्पोस्टर सिंड्रोम का है असर

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Impostor Syndrome When You Doubt Your Capabilities: कभी-कभी हर कोई अपने में कमियां ढूंढता है, खुद की काबिलियत पर सवाल उठाता है, लेकिन अगर आप अक्सर ऐसा करते हैं तो आपको सचेत होने की जरूरत है, क्योंकि आप इम्पोस्टर सिंड्रोम (Impostor Syndrome) के शिकार हो सकते हैं. ये एक ऐसी बीमारी है, जिसमें लोग खुद की ही उपलब्धियों, काबिलियत और कामयाबी पर शक करने लगते हैं. उन्हें लगने लगता है वो किसी लायक नहीं है और उनकी हासिल कि गई हर कामयाबी धोखा है या वो खुद को धोखेबाज (Fraud) की श्रेणी में गिनने लगते हैं. ये सिंड्रोम किसी नौकरी या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बगैर किसी पर भी हावी हो सकता है, लेकिन अक्सर अति महत्वकांक्षी लोग इसका सामना करते हैं. कुछ लोगों में इसके लक्षण सीमित वक्त तक रहते हैं, जैसे नई नौकरी के शुरुआती दिनों में, तो कुछ में इसके लक्षण आजीवन रहते हैं. आज हम खुद ही की काबिलियत पर शक पैदा कर देने वाले इसी सिंड्रोम पर बात करेंगे, आखिर कैसे लोग इसका शिकार बनते हैं और ये होता क्यों है?

44 साल पहले हुआ इम्पोस्टर सिंड्रोम का खुलासा

मनोवैज्ञानिकों (Psychologists) ने पहली बार 1978 में इम्पोस्टर सिंड्रोम के बारे में बताया था. साल 2020 की एक समीक्षा के मुताबिक नौ से 82 फीसदी लोग जिंदगी में कभी न कभी इम्पोस्टर सिंड्रोम का अनुभव करते हैं. आखिर कैसा अनुभव करता है इस सिंड्रोम का मरीज, उसकी पहचान कैसे हो सकती है, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है. इस सिड्रोंम के लक्षणों के बारे मनोवैज्ञानिकों ने बताया है. मेडिकल न्यूज टूडे के मुताबिक इस सिंड्रोम से ग्रस्त शख्स को धोखेबाज होने का एहसास होता है. उसे लगता है कि उसने कुछ गलत किया है और कोई उसकी गलती को पकड़ सकता है. इस बात से वह हमेशा डरा-डरा महसूस करता है. आलम यह होता है कि वह अपनी कामयाबी को भी शक की नजर से देखने लगता है. उसे विश्वास ही नहीं होता कि जो उसने हासिल किया है वह उसकी काबिलियत का नतीजा है. कुछ हद तक खुद पर संदेह करने की भावना इंसान को उसकी उपलब्धियों और क्षमता का आकलन करने में मदद दे सकती है, लेकिन बहुत अधिक आत्म-संदेह किसी व्यक्ति की खुद की छवि पर भी गलत असर डालता है. यही लक्षण इम्पोस्टर सिंड्रोम वाले व्यक्ति में दिखाई पड़ते हैं. इसकी वजह से उसकी जिंदगी के कई पहलू प्रभावित होते हैं. जैसे काम के प्रदर्शन पर असर पड़ना, खुद पर संदेह करना, अपनी कामयाबी के लिए बाहरी फैक्टर्स को जवाबदेह ठहराना. 

काम के प्रदर्शन पर असर

इम्पोस्टर सिंड्रोम से जूझ रहे शख्स को डर हो सकता है कि उसके सुपरवाइजर उसे उसकी काबिलियत से अधिक काम मैनेज करने को दे रहे हैं. वह ये काम कर के देने में खुद को असमर्थ पाता है. ऐसे शख्स के मन में असफलता का डर घर कर जाता है. नतीजन वह बड़ी उपलब्धियों को हासिल करने से खुद को रोकता रहता है. उसे हमेशा हर काम को गलत करने का डर सताता रहता है. इस तरह से यह सिंड्रोम उसके पूरे काम के प्रदर्शन पर असर डालता है. 

सीमित जिम्मेदारियां पर फोकस करना

2014 में प्रकाशित शोध के अनुसार, इम्पोस्टर सिंड्रोम वाले लोग अतिरिक्त कामों की जिम्मेदारियों लेने से बचते रहते हैं. वह सीमित कामों पर ही ध्यान देते हैं. इससे उनकी खुद की क्षमताओं को साबित करने के प्रदर्शन पर असर पड़ता है. वह हमेशा इस डर से अतिरिक्त काम करने से बचते रहते हैं कि इससे उस काम की क्वालिटी पर असर पड़ेगा, यानि वह उस अतिरिक्त काम को सही तरीके से नहीं कर पाएंगे.

खुद पर शक

इस तरह के सिंड्रोम का सामना करने वाले लोग खुद की सफलता पर ही संदेह करने लगते हैं. यहां तक ​​कि जब ऐसा शख्स बेहद अहम कामयाबी पाता है, तब भी वह अपनी उपलब्धियों को पहचानने में नाकामयाब रहता है. इस सफलता का जश्न मनाने के बजाय वह चिंता में डूब जाता है. उसे लगता है कि उसने जो हासिल किया है वह उसे अनायास ही किस्मत के बल पर मिल गया है. उसे लगता है कि दूसरों को ये सच्चाई पता चल जाएगी कि जो उसे मिला है उसमें उसकी काबिलियत का फल नहीं है.

अपनी सफलता का क्रेडिट बाहरी कारकों को देना

इम्पोस्टर सिंड्रोम का मरीज अपने को लेकर इतना आत्म-संदेही हो जाता है कि वह अपनी काबिलियत को भी नकारता है. उसे लगता है कि उसकी कामयाबी बाहरी कारकों का संयोग है. इस पर अगर कभी चीजें गलत हो जाती हैं, तो वह इसके लिए भी खुद को ही जिम्मेदार ठहराता और दोष देता है. 

नौकरी में असंतोष और बेहतर न कर पाना

कुछ मामलों में इम्पोस्टर सिंड्रोम से जूझ रहा शख्स अपने कार्यस्थल पर भी चुनौतियों का सामना नहीं कर पाता है. उसे हमेशा असफलता और अपनी कमी के पकड़े जाने का बेकार का डर सताता रहता है. इस तरह का रवैया उसके प्रमोशन और अतिरिक्त जिम्मेदारियों को निभाने की राह में भी रुकावट पैदा करता है. वह हमेशा अपनी कमियों से पार पाने की भावना से घिरा रहता है.  इससे सब में वह मानसिक तौर पर इतना थक जाता है कि उसे अपनी काबिलियत पर भरोसा नहीं रहता. साल 2014 के स्टडी के नतीजे बताते हैं कि इस सिंड्रोम वाले लोग अपने पदों पर बने रहते हैं क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं होता कि वे बेहतर कर सकते हैं.  इस तरह का व्यक्ति अपने कौशल को कम आंक सकता है या यह उसे पहचानने में असफल हो सकता है कि अन्य रोल में उसकी काबिलयत उसे बेहतर पॉजिशन तक पहुंचा सकती है. 

प्रमोशन मांगने से बचना

अपने कौशल और क्षमताओं को कम आंकने की वजह से इम्पोस्टर सिंड्रोम वाले लोग अपने महत्व को नकार सकते हैं. इस वजह से वह अपने कार्यक्षेत्र में प्रमोशन मांगने से बचते रहते हैं, क्योंकि उन्हें यकीन ही नहीं होता कि वे इसके लायक है. साल 1978 में की गई एक स्टडी में सामने आया कि एक शख्स को नौकरी में बेहतर पोस्ट मिलने पर उनका मानना था कि चयन प्रक्रिया में गलती हुई होगी, क्योंकि उन्होंने लगा कि वे इस पद के काबिल कैसे हो सकते हैं.  

कार्यों और लक्ष्य निर्धारण पर फोकस

इस सिंड्रोम में असफलता का डर और सर्वश्रेष्ठ होने की आवश्यकता कभी-कभी अत्यधिक उपलब्धि की महत्वकांक्षा में बदल जाती है. इससे व्यक्ति खुद के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण लक्ष्य निर्धारित कर सकता है और जब वो उन्हें प्राप्त करने में असमर्थ होता है, तो निराशा का अनुभव करता है.

मानसिक सेहत पर असर

खुद को बहुत हद काबिल न मानने का डर  कुछ मामलों में मानसिक सेहत संबंधी परेशानियों की वजह बनता है. ऐसी स्थिति में इम्पोस्टर सिंड्रोम से जूझ रहा शख्स चिंता, खुद के धोखेबाज होने की भावना, डिप्रेशन, निराशा, आत्मविश्वास की कमी और शर्म का अनुभव करता है. हालांकि, विशेषज्ञ इस सिंड्रोम को मानसिक सेहत खराब होने वाली श्रेणी में नहीं रखते हैं. 

इम्पोस्टर सिंड्रोम के प्रकार

द सीक्रेट थॉट्स ऑफ सक्सेसफुल वीमेन: व्हाई कैपेबल पीपल सफ़र फ्रॉम द इम्पोस्टर सिंड्रोम और हाउ टू थ्राइव इन स्पाइट ऑफ़ इट के लेखक डॉ. वैलेरी यंग (Dr. Valerie Young) ने पांच प्रकार के “इम्पोस्टर” की पहचान की है. इनमें पहला है विशेषज्ञ टाइप- इस तरह के लोग किसी भी काम को पूरा करते समय तब तक संतुष्ट महसूस नहीं करते, जब -तक उन्हें यह महसूस न हो कि वे सबजेक्ट के बारे में सब कुछ जानते हैं. इस तरह के लोगों में इनका जानकारी जुटाने में लगाया गया वक्त इनके कामों और प्रोजेक्ट को पूरा करना मुश्किल बना सकता है. दूसरी श्रेणी में आते परफेक्शिनस्ट यह खुद के लिए ऐसे लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं जो उनके बस से बाहर होता है. इस वजह से चिंता, संदेह और अवसाद का सामना करते हैं. ये अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाने के बजाय उस बात पर अधिक फोकस करते हैं कि वह कहां बेहतर कर सकते थे. तीसरी श्रेणी में नेचुरल जीनियस आते हैं. ये नए स्किल्स को जल्दी और आसानी से हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब इनके सामने को कोई बेहद लक्ष्य आ जाता है, तो ये लोग शर्म और खुद को कमजोर महसूस कर सकते हैं. चौथी श्रेणी में  एकला चलो वाले इम्पोस्टर आते हैं ये अकेले काम करना पसंद करते हैं. इसी वजह से ये हमेशा किसी भी काम में मदद मांगने से डरते हैं कि इससे उनकी अक्षमता का पता चल जाएगा. अपने को खुद बहुत आंकने के कारण इस तरह के इम्पोस्टर किसी भी तरह की मदद को ठुकरा देते हैं. पांचवी तरह के इम्पोस्टर सुपरहीरो टाइप होते हैं, जो बहुत कोशिशों के बाद उत्कृष्टता हासिल करते हैं, जैसा कि “वर्कहॉलिज़्म” में होता है. इससे बर्नआउट हो सकता है, जो शारीरिक और मानसिक सेहत और दूसरों के साथ संबंधों पर असर डाल सकता है

खतरे भी कम नहीं

किसी भी शख्स में इम्पोस्टर सिंड्रोम के लक्षण उभर सकते हैं, लेकिन कुछ ऐसे कारण हैं जिससे इसके खतरे और बढ़ते हैं. कई बार हाल में ही मिला बेहतरीन अवसर, प्रमोशन भी व्यक्ति में इम्पोस्टर सिंड्रोम को जन्म देता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति नई पोजिशन में खुद ढाल नहीं पाता. उसे लगता है कि उसे जो मिला वह उसके लायक नहीं था. उसे महसूत होने लगता है कि वह बेहतरीन करने में सफल नहीं हो पाएगा. कई मामलों में परिवार का माहौल भी इम्पोस्टर सिंड्रोम की वजह बनता है. जब कोई शख्स “प्रतिभाशाली” भाई-बहन के साथ बड़ा होता है, तो वे खुद के अंदर में कमी होने की भावना से घिर जाता है, जो सही नहीं है. इसके उलट अगर वह खुद प्रतिभावान पैदा होता है तो मुश्किल परिस्थितियों का सामना होने पर वह खुद की काबिलियत पर ही शक करने लगता है. रिसर्च बताती है कि हाशिए पर रहने वाले समुदाय के लोग भी इम्पोस्टर सिंड्रोम के आसानी से शिकार बनते हैं. इसमें भेदभाव भी एक बहुत बड़ी वजह होती है. अवसाद और चिंता का होना ये इंपोस्टर सिंड्रोम वाले लोगों में आम बात हैं. हालांकि कई रिसर्च में ये साबित हो चुका है कि ये सिंड्रोम केवल महिलाओं को ही अपनी चपेट में नहीं लेता, बल्कि इसका दायरा उम्र, जेंडर से परे होता है. 

इम्पोस्टर सिंड्रोम पर काबू पाने के टिप्स

मौजूदा वक्त में इम्पोस्टर सिंड्रोम के लिए कोई खास उपचार नहीं है. जो लोग अपनी जिंदगी में इसके प्रभाव को लेकर परेशान हैं, तो वे लोग मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर से मदद ले सकते हैं. कई मामलों में इस के बारे में खुलकर बात करने से भी इस सिंड्रोम की गंभीरता को कम किया जा सकता है. ऐसे में परिवार, मित्र मंडली, सहकर्मी जो भी भरोसेमंद हो उनसे अपनी भावनाओं को साझा करने से इम्पोस्टर सिंड्रोम से परेशान शख्स को राहत मिल सकती है. इससे उन्हें अपनी काबिलियत के बारे में अधिक यथार्थवादी दृष्टिकोण विकसित करने में मदद मिल सकती है. हालांकि कुछ विशेषज्ञ समूह चिकित्सा को उपचार का विकल्प भी सुझाते हैं, क्योंकि इस सिंड्रोम वाले कई लोग गलती से मान बैठते हैं कि केवल उनके पास ही केवल ये भावनाएं हैं. इससे उनमें अन्य लोगों से अलगाव होता है. इसके साथ ही मेंटल हेल्थ प्रोफेशनल्स के पास जाने से इम्पोस्टर सिंड्रोम वाला शख्स खुल कर अपनी बात कह पाता है. इससे उसे अपनी भावनाओं की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिससे उन्हें इसके कारणों से निपटने का मौका मिलता है. इस सिंड्रोम के लक्षणों को जानना भी जरूरी है ताकि इसका सटीक इलाज हो पाए. इसके साथ ही इस सिंड्रोम से बचाव के लिए इस बात को स्वीकार करने की आदत डालना भी जरूरी है कि परफेक्शन कहीं नहीं होता. इससे खुद की ताकत और कमजोरियों दोनों को स्वीकार करने की हिम्मत आती है. लगता है कि कोई भी शख्स संपूर्ण नहीं होता है, और गलतियां जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा हैं. इस तरह की लचीली सोच मानसिक सेहत को अच्छा रखती है. इसके अलावा इस सिंड्रोम से निपटने में नेगेटिव विचारों को चुनौती देने का रवैया भी कारगर साबित होता है. इसमें अपनी मौजूदा उपलब्धियों पर जश्न मनाना, खुशी जाहिर करना, अपनी बीती कामयाबियों को याद करना, अपने सकारात्मक पलों का रिकॉर्ड रखना भी एक अच्छा ट्रीटमेंट है.

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