आज का शब्द: महनीय और रामगोपाल ‘रुद्र’ की कविता- निश्छल अंतर

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                            'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- महनीय, जिसका अर्थ है- मान्य, पूज्य, श्रेष्ठ, महान। प्रस्तुत रामगोपाल 'रुद्र' की कविता- निश्छल अंतर
                                                                                                
                                                     
                            

निश्छल अन्तर छल पर ढलकर अपनी आँखों दयनीय हुआ!

रज के तारों की क्या चर्चा, रजनी के तारों को देखो!
मन के हारे क्या होते हैं, अपने से हारों को देखो;
इतने ऊँचे चढ़नेवाले, ऐसी गति से चलनेवाले,
भू के खींचे भू पर आए टूटे बेचारों को देखो;

तारे तो घुल-घुल ओस हुए, अवनी ने दिखलाई माया
अभिनन्दन का सामान किया, दुधिया पलकों पर बिठलाया!
मन में पाताल रहा रमता, मुँह पर छलकी नभ की ममता;
तारों ने जग को नहलाया, जग ने तारों को बहलाया!
यह तो कहिए, दिन उग आया, झूठा मुँह कमनीय हुआ!

धरती का मुँह जोहा करता जो चाँद, चकोर बना, ऊपर,
कटते-कटते कट जाता है, लुट जाता है, नभ से चूकर;
ज्वारों पर आता है तो पाता है उपहास, कलंकी है!
मिट जाता है बेचारा, तो मनती है दीवाली भू पर!

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1 hour ago



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