अफगानिस्तान में ठंड से 157 मौतें: 77 हजार मवेशी भी मरे, माइनस 28 डिग्री पहुंचा टेम्परेचर; दो तिहाई आबादी को तुरंत मदद की जरूरत

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काबुल15 मिनट पहले

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अफगानिस्तान में 15 दिन के भीतर भीषण ठंड से 157 लोगों की जान चली गई। 77 हजार मवेशी भी मारे गए। यहां तापमान माइनस 28 डिग्री पहुंच चुका है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार (UNOCHA) के मुताबिक, देश के 2 करोड़ 83 लाख लोग यानी करीब दो तिहाई आबादी को जिंदा रहने के लिए तुरंत मदद की जरूरत है। ठंड के चलते 10 जनवरी से 19 जनवरी तक 78 मौतें हुई थीं। पिछले एक हफ्ते में ये आंकड़ा दोगुना हो गया।

अफगानिस्तान के डिजास्टर मैनेजमेंट मिनिस्टर मोहम्मद अब्बास अखुंद ने बताया कि ज्यादातर मौतें ग्रामीण इलाकों में हुई है। तालिबान के सत्ता में आते ही अफगानिस्तान में आर्थिक और मानवाधिकार संकट बढ़ता जा रहा है। हाल ही में NGO में महिलाओं के काम करने पर बैन लगा दिया गया है। इसके चलते भी मौसम की मार से जूझ रहे लोगों तक मदद पहुंचने में दिक्कत आ रही है।

तस्वीरों में देखें अफगानिस्तान में ठंड के हालात…

डिजास्टर मैनेजमेंट मिनिस्टर मुल्ला मोहम्मद अब्बास अखुंद के मुताबिक, ज्यादातर मौतें ग्रामीण इलाकों में हुई है।

डिजास्टर मैनेजमेंट मिनिस्टर मुल्ला मोहम्मद अब्बास अखुंद के मुताबिक, ज्यादातर मौतें ग्रामीण इलाकों में हुई है।

मुल्ला मोहम्मद अब्बास अखुंद का कहना है कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं कम हैं, जिसके चलते यहां ज्यादा मौतें हो रही हैं।

मुल्ला मोहम्मद अब्बास अखुंद का कहना है कि गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं कम हैं, जिसके चलते यहां ज्यादा मौतें हो रही हैं।

भारी बर्फबारी के चलते अफगानिस्तान-पाकिस्तान हाई-वे में जाम लगा हुआ है। इसके चलते जरूरत का सामान अफगानिस्तान पहुंच नहीं पा रहा है।

भारी बर्फबारी के चलते अफगानिस्तान-पाकिस्तान हाई-वे में जाम लगा हुआ है। इसके चलते जरूरत का सामान अफगानिस्तान पहुंच नहीं पा रहा है।

ये तस्वीर बदख्शां प्रांत के यफ्ताली सुफला जिले की है। यहां पानी की कमी चल रही है। लोगों को पानी के लिए कई किलोमीटर का सफर करना पड़ रहा है।

ये तस्वीर बदख्शां प्रांत के यफ्ताली सुफला जिले की है। यहां पानी की कमी चल रही है। लोगों को पानी के लिए कई किलोमीटर का सफर करना पड़ रहा है।

UNOCHA ने बताया कि उसने जनवरी में अफगानिस्तान में 5 लाख 65 हजार 700 लोगों तक कंबल, शेल्टर और अन्य मानवीय सहायता पहुंचाई है।

UNOCHA ने बताया कि उसने जनवरी में अफगानिस्तान में 5 लाख 65 हजार 700 लोगों तक कंबल, शेल्टर और अन्य मानवीय सहायता पहुंचाई है।

हालात बिगड़ने की 3 वजहें

1. NGO पर नए बैन के बाद मदद के लिए चल रहे ऑपरेशन बंद
तालिबान ने दिसंबर 2022 में NGO में काम करने वाली महिलाओं पर बैन लगा दिया था। इसके बाद वहां मदद पहुंचा रहे विदेशी सहायता समूहों ने अपने ऑपरेशन बंद कर दिए थे। इन समूहों में ज्यादातर महिलाएं ही काम करती थीं। इस सिलसिले में UN की डिप्टी सेक्रेटरी जनरल अमिना मोहम्मद ने काबुल का दौरा भी किया था। उन्होंने महिलाओं पर लगे बैन को हटाने के मुद्दे पर चर्चा की थी। उन्होंने इसे महिलाओं के अधिकारों का हनन बताया था।

2. विदेशों से 70% फंड मिलता था, वह भी बंद हो गया
अफगानिस्तान सरकार को खर्च चलाने के लिए अमेरिका समेत दूसरे देशों से 75% से भी ज्यादा फंड मिलता था। लेकिन 2021 में करीब 20 साल बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला ली। इस फैसले के बाद फंडिंग की व्यवस्था चरमरा गई। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि मानवीय आधार पर आर्थिक मदद दे सकते हैं, लेकिन सीधे तौर पर कोई इकोनॉमिक सपोर्ट या सेंट्रल बैंक के असेट्स को डीफ्रीज करने का फैसला तालिबान के रवैए पर निर्भर होगा।

3. अफगानिस्तान में महंगाई बढ़ी, प्राइवेट बैंकों में नकदी का संकट
तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान के सेंट्रल बैंक की करीब 10 अरब डॉलर की संपत्तियां विदेशों में फ्रीज कर दी गई थीं। इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड ने भी 44 करोड़ डॉलर का इमरजेंसी फंड ब्लॉक कर दिया। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि अफगानिस्तान इस वक्त करंसी की वैल्यू में गिरावट, खाने-पीने की चीजों, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी इजाफा और प्राइवेट बैंकों में नकदी की कमी जैसे संकटों का सामना कर रहा है। यहां तक कि संस्थाओं के पास स्टाफ का वेतन देने तक के पैसे नहीं हैं।

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अफगानिस्तान में तालिबान सरकार का एक साल पूरा हुआ। अमेरिकी फौज के जाने के बाद यहां के हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। तंगहाल अफगानिस्तान में 80 फीसदी परिवारों के बच्चे भूखे ही सोने को मजबूर हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार बच्चों को एक टाइम का खाना ही मिल पा रहा है। इसमें भी परिवार की लड़कियों को लड़कों की तुलना में कम भोजन मिल पा रहा है। पढ़ें पूरी खबर…

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अफगानिस्तान की जाहिदा ने एक चिट्ठी लिखी है। ये साल भर बाद उसकी दूसरी चिट्ठी है। जाहिदा ने जब पहली चिट्ठी लिखी थी, तब तालिबान की फौज ने उनके शहर में घुसना शुरू किया था। अब देश में उसकी सरकार है।

एक साल पहले अगस्त की 15 तारीख को तालिबान ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था। तालिबान को 20 साल बाद दोबारा काबुल की सत्ता मिली थी। जाहिदा की उम्र भी 20 साल ही है। यानी इस एक साल को छोड़ उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी बिना पाबंदियों के बिताई थी। पढ़ें पूरी खबर…

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