‘अक्कड़-बक्कड़’ से लेकर ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ तक मशहूर कविताओं के गुमनाम कवि

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रचना और रचनाकार का सम्बन्ध पिता और सन्तति का सम्बन्ध होता है. यह किसी रचनाकार की सफलता का उत्कर्ष है कि उसकी कोई पंक्ति जनभाषा के मुहावरे में शुमार हो जाये.

‘अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो’ से लेकर ‘पोशम्पा भई पोशम्पा’ तक का हमारा बचपन ऐसी ही सौभाग्यशाली कविताओं की उंगली थामकर चला है. किन्तु इन कविताओं के साथ एक दुर्भाग्य भी जुड़ा हुआ है कि इनके रचनाकार का नाम इनकी लोकप्रियता के वेग में कहीं गुम हो गया है.

कभी-कभी लगता है कि अपने कवि के नाम के बिना दुनिया भर में घूम रही इन कविताओं के रचनाकारों के साथ अनजाने में ही सही, लेकिन बड़ा अन्याय हो गया है. मैंने अपने आसपास के भाषाई मुहावरे की पड़ताल की, तो पाया यह अन्याय आज भी बदस्तूर जारी है. बल्कि सोशल मीडिया के दौर में तो इसमें ख़ासी वृद्धि देखने को मिलती है.

कोई एक काव्यप्रेमी कवि की वॉल से कविता कॉपी करता है तो न जाने क्यों उसका माउस कविता के नीचे लिखा कवि का नाम कॉपी नहीं कर पाता. फिर वही रचना व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम और न जाने किन-किन मुहल्लों में बिना नाम के घूमती-फिरती है और एक दिन कोई अन्य काव्यप्रेमी उसका ख़ूबसूरत वॉलपेपर डिज़ाइन करके उसके नीचे ग़ालिब, बच्चन या गुलज़ार का नाम चिपका देता है.

फिलहाल आपको कुछ ऐसी कविताओं से परिचित कराया जा रहा है, जिन्हें आप अपनी अभिव्यक्ति को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए सहज ही प्रयोग कर लेते हैं. कभी मुहावरा बनकर तो कभी लोकोक्ति बनकर. ये कविताएं हमारी बोलचाल में इतनी रच बस गयी हैं कि इनके रचनाकार का नाम जानने का हमें ख़्याल ही नहीं आता.

कबीर इस प्रवृत्ति के सर्वाधिक शिकार रहे हैं. उनके कुछ दोहों की पंक्तियां तो बाक़ायदा मुहावरा बन चुकी हैं-

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत
अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

करता था तो क्यों किया, अब करि क्यों पछताय
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय

शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाये, जिसे इन दोनों रचनाओं की पहली पंक्ति याद हो. और शायद ही हमारे आसपास कोई ऐसा व्यक्ति मिल पाए, जिसे इन दोनों रचनाओं की दूसरी पंक्ति याद न हो. यद्यपि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम जनजीवन में सर्वाधिक उद्धृत किये जाने वाले कवियों में कबीर अग्रणी हैं. कबीर का ही एक और दोहा है जिसकी पहली पंक्ति प्रसिद्धि को प्राप्त हुई और दूसरी गुमनामी को :

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैंठ
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ

उर्दू शायरी में भी अनेक ऐसे मिसरे मिल जाते हैं, जो इतनी तेज़ी से लोकभाषा का मुहावरा बन गये कि उनका अपना दूसरा मिसरा ही उनकी गति का साथ न दे सका. ऐसे में ये मिसरे अकेले ही प्रचलन में आ गये. इस मुआमले में उर्दू के ग़ालिब की स्थिति भी लगभग वैसी ही है जैसी हिन्दी में कबीर की है. मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ मिसरे देखें-

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है

उर्दू में ऐसे और भी अनेक उदाहरण मिलते हैं, जहां कोई एक ही मिसरा दूर तक पहुंचा और दूसरा मिसरा अपने शायर के नाम के साथ गुमनाम रह गया. मसलन मुज़फ्फर रज़्मी का एक मिसरा लगभग रोज़ ही कहीं न कहीं पढ़ा जा रहा होता है-

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई

इसी तरह फै़ज़ अहमद फै़ज़ की नज़्म का एक मिसरा हर नुक्कड़ चैपाल पर सुनने को मिल जाता है-

और भी दुःख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं, वस्ल की राहत के सिवा

दिल्ली के बाशिंदे अक्सर ज़ौक़ साहब के इस शेर का एक ही मिसरा दोहराते देखे जाते हैं-

इन दिनों गरचे दकन में है बड़ी क़द्र-ए-सुख़न
कौन जाए ‘ज़ौक़’ पर दिल्ली की गलियां छोड़कर

कभी कोई काव्यांश किसी फिल्मी गीत में प्रयुक्त हो गया तो फिर उसके मूल रचनाकार और रचना को तलाशना और कठिन हो जाता है. मसलन तुराब ककोरबी के इस शेर का एक मिसरा ज्यों ही फिल्मी गीत में जा मिला तो अस्ल शेर याद करने की न तो किसी को फुरसत मिली न ज़रूरत ही महसूस हुई-

शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी
कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को

इसी तरह मियां दाद खां सय्याह के इस शेर का एक मिसरा अक्सर वक़्त-ए-शाम सुनने को मिल जाता है-

कैस जंगल में अकेला है, मुझे जाने दो
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ‘बबूता का जूता’ की एक पंक्ति फिल्मी गाने से जुड़ गई और मूल कवि का ज़िक्र तक करने की नैतिकता नहीं निभाई गई. जब यह फिल्म आयी थी तो इस विषय को लेकर शायद कुछ कानूनी विवाद भी हुआ था लेकिन सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की ओर से लड़ने वालों की इतनी पहुंच नहीं थी कि फिल्मी गुलज़ारों से टक्कर ले पाते-

इब्नबतूता पहन के जूता निकल पड़े तूफान में
थोड़ी हवा नाक में घुस गई, घुस गई थोड़ी कान में

बुल्लेशाह के लेखन पर तो ऐसी फिल्मी डकैती ख़ूब पड़ती रहती है. उनके लिखे को अपनी शायरी में फिट करके कई लोगों के चमन गुलज़ार हुए जा रहे हैं. अब बात करते हैं उन रचनाओं की जो उद्धृत तो कविता के रूप में ही होती हैं लेकिन उनके रचनाकार की सुधि किसी को नहीं आती.

एक गीत जो झण्डा फहराते समय ख़ूब गाया जाता है. बचपन में विद्यालय के महोत्सवों से लेकर दफ़्तर में स्वतंत्रता दिवस पर ध्वजारोहण करने तक यह गीत हर भारतीय ने दर्जनों बार सुना भी है और गाया भी है. इस भूमिका से ही गीत के बोल आपको याद आ गये होंगे – ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा.’ लेकिन इस गीत के रचयिता का नाम जानने वाले लोग उंगलियों पर गिने जा सकते हैं. यह अमर गीत रचा है श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने.

लगभग इतनी ही प्रसिद्धि प्राप्त करने वाली दो पंक्तियां ‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा’ भी जगदम्बिका प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ के नाम को पीछे छोड़ बहुत आगे निकल गईं.

‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ गीत देश भर के विद्यालयों में रोज़ सुबह प्रार्थना की तरह गाया जाता है. यह दरअस्ल एक फिल्मी गीत है, जो अभिलाष जी ने अंकुश फिल्म के लिए लिखा था. इसके बावजूद किसी विद्यालय में विद्यार्थी तो क्या अध्यापकों तक के भीतर यह जिज्ञासा नहीं उपजती कि जिसकी रचना से दिन की शुरुआत की जाती है उसे रचनेवाला शख़्स कौन है!

जो गीत भजन बन गया उसके रचनाकार का नाम ग़ायब हो जाना तो लगभग निश्चित ही है. कीर्तन मंडलियां और जागरण की आर्केस्ट्रा पार्टियां किसी भी भजन को गाते समय उसमें अपना नाम इतनी बेहूदगी के साथ घुसेड़ती हैं कि यदि मूल रचनाकार सुन ले तो स्वयं अपनी रचना पर दावा करने का विचार त्याग दे.

इस प्रवृत्ति ने मीराबाई की रचना ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ तक को नहीं छोड़ा. ‘मीरा के प्रभु गिरिधर नागर’ वाली पंक्ति गाते समय ‘मीरा’ शब्द को न जाने किस-किस के नाम से बदल दिया जाता है और प्रभु गिरिधर नागर चुपचाप देखते रह जाते हैं.

कुछ रचनाएं ऐसी भी हैं जो किसी प्रसिद्ध व्यक्ति ने किसी सन्दर्भ में उद्धरित कर दें तो लोग उन्हें उन्हें व्यक्तित्वों के नाम से जानने लगे. इस क्रम में नरसी भगत की रचना ‘वैष्णव जन ते तेने कहिये’ सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है. यह गीत महात्मा गांधी का प्रिय गीत था, किन्तु एक बहुत बड़ा तबका इसे गांधी जी का गीत ही मान बैठा है. इसी प्रकार शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की रचना ‘ना हार में ना जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं’ किसी सभा में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने उद्धृत की तो लोग इसे अटल जी की रचना ही मानने लगे.

इसी तरह एक ग़ज़ल है, जो भारतीय क्रांति के इतिहास में रह-रहकर याद की जाती है. ‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ -यह ग़ज़ल आज़ादी के दीवानों का मंत्र बन गयी, लेकिन इसके शायर, बिस्मिल अज़ीमाबादी को इसका श्रेय मिलने की बजाय इसे क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल के नाम से जाना जाता है.

सोहनलाल द्विवेदी जी का एक गीत भी ऐसे ही किसी भ्रम के कारण श्री हरिवंशराय बच्चन जी के नाम से मशहूर हो गया. और यहां तक मशहूर हुआ कि बाद में अमिताभ बच्चन ने सार्वजनिक मंच पर इस बात का स्पष्टीकरण दिया कि ‘कोशिश करने वालों की हार नहीं होती’ श्री सोहनलाल द्विवेदी जी की ही रचना है.

इसी प्रकार श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध की रचना ‘उठो लाल अब आंखें खोलो’ कहीं सोहनलाल द्विवेदी जी के नाम से लिखी मिलती है तो कहीं द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी जी के नाम से.

गयाप्रसाद शुक्ल सनेही जी का एक काव्यांश ‘जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं, वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं.’ इस रचना को अपने भाषण आदि में प्रयोग करने वाले लोग भी सनेही जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना अक्सर भूल जाते हैं.

प्रसाद जी की ही यह कविता भी भरपूर उद्धृत की जाती है-

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्ज्वला स्वतन्त्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पन्थ है बढ़े चलो, बढ़े चलो

सुमित्रानन्दन पन्त जी का भी एक काव्यांश भरपूर प्रयोग किया जाता है. यद्यपि अधिकतर यह कवि के नाम के बिना ही प्रयोग किया जाता है, लेकिन इसके रचनाकार के नाम की गवाही देने वाले लोग अभी जीवित हैं-

वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान
निकलकर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान

इसी क्रम में गोपालदास नीरज जी के गीत का यह मुखड़ा भी ख़ूब सुनने को मिलता है-

जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये

दुष्यंत कुमार का एक शेर ख़ूब रेखांकित किया जाता है लेकिन उसे बिल्कुल सही पढ़ने वाले लोग बहुत कम हैं. कोई आकाश की जगह आसमान या अम्बर पढ़ने लगता है तो कोई सूराख को छेद पढ़कर शेर की जान निकाल देता है. शब्दों का क्रम बिगाड़कर शेर को बेबह्रा पढ़ने वाले तो बहुतायत में हैं ही. बहरहाल, यहां वह शेर अपने मूल स्वरूप में प्रस्तुत है-

कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!

इन सब रचनाओं के इतर यहां ऐसी अनेक रचनाओं की सूची दी जा रही है, जो या तो अपने रचनाकार के नाम के बिना प्रयुक्त हो रही हैं, या किसी अन्य के नाम से चल रही हैं या फिर आधी-अधूरी और ग़लत-सलत तरीक़े से उद्धृत की जा रही हैं :

जब नाश मनुज पर छाता है
पहले विवेक मर जाता है
रामधारी सिंह दिनकर

सदियों की ठण्डी बुझी आग सुगबुगा उठी
मिट्टी, सोने का ताज पहन इठलाती है
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो
सिंहासन ख़ाली करो, कि जनता आती है
रामधारी सिंह दिनकर

देखकर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं
काम कितना ही कठिन हो, किन्तु उकताते नहीं
भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध

चार हाथ, चैबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूकै चैहान
चन्द बरदाई

य’ह कदम्ब का पेड़ अगर मां होता जमुना तीरे
मैं भी इस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे
सुभद्राकुमारी चैहान

होंगे क़ामयाब, हम होंगे क़ामयाब एक दिन
मन में विश्वास, पूरा है विश्वास
हम होंगे क़ामयाब एक दिन
गिरिजाकुमार माथुर

ऐसे और भी अनेक काव्यांश हैं, जिनके मूल रचयिता का नाम कहीं समय की परतों के नीचे खो गया है. इसी तरह वंशीधर शुक्ल जी का लिखा ‘उठ जाग मुसाफ़िर भोर भयी’ भी रोज़ कहीं न कहीं रेखांकित किया जाता है, लेकिन कवि का नाम लेने को यहां भी कोई तैयार नहीं होता. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी का क़दमताल गीत ‘क़दम-क़दम बढ़ाये जा, ख़ुशी के गीत गाये जा, ये ज़िन्दगी है क़ौम की, तू क़ौम पे लुटाये जा’ भी मूल गीतकार के नाम के बिना ही दुनिया भर में जोश भरने का काम कर रहा है. इस गीत का अनेक फिल्मों में भी प्रयोग किया गया है.

सोशल मीडिया के इस दौर में यदि इस श्रेय देने की परम्परा का प्रादुर्भाव इस लेख के बाद हो सका, तो सृजन की इस बगिया में जड़ों की देखभाल करने वाले लोगों को अपने मिट्टी सने हाथों को देखकर क्षोभ न होगा. एक बार हमें ठहर कर यह विचार करना चाहिए कि रचनाकार को कर्त्ताभाव से मुक्त करने के चक्कर में कहीं हम स्वयम् तो कृतज्ञताभाव से मुक्त होकर कृतघ्न नहीं हो गये

– चिराग जैन

(लेखक युवा कवि हैं और ‘कविग्राम’ नाम से एक डिजिटल साहित्य पत्रिका का भी प्रकाशन करते हैं.)



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